शनिवार, 30 जनवरी 2010

न्याय व्यवस्था में सुधार

वीरप्पा मोइली नि:संदेह प्रशंसा के पात्र हैं। उन्होंने एक ऐसा महत्वपूर्ण फैसला लिया है जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है। मोइली का यह निर्णय स्वागत योग्य है कि देश में डेढ़ लाख विचाराधीन कैदियों को जेलों से रिहा किया जाएगा। जिन्हें जेलों की हालत पता नहीं है वह मधुर भंडारकर की फिल्म जेल देख लें। सालों से तमाम ऐसे कैदी देश की जेलों मंें बंद हैं जिनका अपराध छोटा-मोटा है, लेकिन वकील न कर पाने के कारण अथवा अदालतों में देरी से सुनवाई के कारण या फिर पैरवी के लिए कोई न होने के कारण जेलों में सड़ रहे हैं। हजारों कैदी तो ऐसे हैं जो अपने अपराध के लिए कानून में निर्धारित सजा से ज्यादा दिन काट चुके हैं, मगर पैरवी के अभाव में तथा अदालतों के ढीले रवैये के कारण जेलों में पड़े हैं। अस्सी-अस्सी एवं नब्बे-नब्बे साल के बुजुर्ग पड़े हुए हैं। अदालतें बेपरवाह हैं, जजों को फिक्र नहीं है कि कौन कितने साल से जेल में सड़ रहा है। इन सबके लिए एक सहारा बनकर कानून मंत्री मोइली और मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन सामने आए हैं। यदि डेढ़ लाख कैदी छह महीने के अंदर छूट जाते हैं तो जेलों का बोझ बहुत कम हो जाएगा। मोइली इस काम के लिए कितने गंभीर हैं, इसका अंदाजा इस बात से ही लगता है कि उन्होंने दिल्ली में स्वयं एक विशेष अदालत में जाकर दर्शक दीर्घा में बैठकर मजिस्ट्रेट का हौसला बढ़ाया और उस मजिस्ट्रेट ने एक दिन में लगभग 40 केसों का निपटारा किया तथा 58 कैदियों को जेल से बाहर किया। यह अभियान अपने स्तर पर हर जिला जज को अपनी अदालतों में चलवाना चाहिए। हाईकोर्ट को भी तत्काल इस काम पर लग जाना चाहिए। जेल विभाग को भी नरमी अपनानी चाहिए तथा जल्दी से जल्दी ऐसे कैदियों की सूची बनानी चाहिए जिन्हें छोड़ा जा सकता है। लाखों परिवारों की जिंदगी गलत न्याय प्रक्रिया और जेलों की लापरवाही के कारण तबाह हो चुकी हैं। मेरा राज्य सरकारों से आग्रह है कि वे तत्काल जेलों के लिए भारी धनराशि का आवंटन करें, जिससे नई बैरक बनाई जा सके। पर्याप्त संख्या में शौचालय और स्नानागार बनवाए जा सकें। एक व्यक्ति को जिंदा रहने के लिए जो सामान्य सुविधाएं दी जानी चाहिए, कम से कम वे तो दी जाएं। पंखों का इंतजाम बैरक में होना चाहिए। खाना-पीना सामान्य तो होना ही चाहिए। सांसदों, विधायकों से भी आग्रह है कि अपनी निधि से इन कामों के लिए जेलों को पैसा देना चाहिए। एक व्यक्ति से यदि अपराध हुआ है तो उसे सजा मिल रही है, लेकिन उसे सामान्य ढंग से जिंदा रहने का अधिकार जेलों के अंदर भी दिया गया है। कम से कम उतना बंदोबस्त तो होना चाहिए। राज्यपालों से भी अनुरोध है कि जो राज्य सरकारें कैदियों की रिहाई का प्रस्ताव भेजती हैं उसे वे तत्काल स्वीकार कर हजारों परिवारों की जिंदगी में रोशनी लाएं। इस मामले में अदालतों को विशेष रूप से पहल करनी होगी। अदालतों में मुकदमों का असहनीय बोझ इस मामले में सबसे बड़ा बाधक है। आंकड़ों के मुताबिक नवंबर, 1999 तक देश की सबसे बड़ी अदालत में 20307 मुकदमें लंबित पड़े थे। जाहिर है अब ग्यारह साल से ज्यादा समय बीतने के बाद इसमें इजाफा ही हुआ होगा। इसी तरह दिसंबर 1998 तक विभिन्न हाईकोर्ट में तकरीबन 32 लाख मुकदमे लंबित पड़े थे, जबकि निचली अदालतों में 2 करोड़ से भी ज्यादा मामले लंबित थे। अब इसमें अगर इनकम टैक्स और विदेशी मुद्रा कानून के उल्लंघन को जोड़ा जाए तो इनसे संबंधित मामलों की संख्या भी लाखों में है। देश में देरी से न्याय मिलने का आलम यह है कि वर्षो तक कैदी जेल में सड़ते रहते हैं और उन्हें न्याय नहीं मिल पाता। इस संदर्भ में जांच एजेंसियां जो भी मामले दर्ज करती हैं उनमें सिर्फ छह फीसदी ही निपट पाते हैं। एक आकलन के मुताबिक औसतन हत्या के एक मामले के निपटारे में बीस साल लग जाते हैं। दहेज हत्या के झूठे मामलों में लोग दस-दस साल से सजा काट रहे हैं। अभी जितने मुकदमे लंबित पड़े हैं, उन्हें निपटाने के लिए पांच हजार कोर्ट तो बनाने ही पड़ेंगे, लेकिन सिर्फ यही एक विकल्प नहीं है। हमें मौजूदा न्याय व्यवस्था में भी कई सुधार करने पड़ेंगे। इसके तहत अदालती छुट्टियों की तादाद कम करनी पड़ेगी। एक साल में एक न्यायाधीश को कितने मामले निपटाने चाहिए, इसकी एक न्यूनतम सीमा तय की जानी चाहिए। वादी को उस मामले में दंडित किया जाना चाहिए जब वह सबूत को न जुटा पाए, लेकिन मामले को चालू रखना चाहिए। इसी तरह हल्के-फुल्के मामलों से संबंधित मुकदमों में तत्काल सुनवाई एवं उसी समय निपटारा करने का प्रयोग करना चाहिए।

कार्यकारी समूह की रिपोर्ट

जस्टिस सगीर अहमद की अध्यक्षता में कश्मीर कार्यकारी समूह की रिपोर्ट से एक बार फिर कश्मीर की स्वायत्तता का मुद्दा सुर्खियों में आ गया है। इस समूह के गठन की घोषणा 24 और 25 मई 2006 को श्रीनगर में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की थी। सगीर अहमद आयोग की ओर से ढाई साल बाद जो रिपोर्ट पेश की गई वह आकार में जितनी मोटी है, मामले की पड़ताल में उतनी ही हल्की है। असलियत में सगीर अहमद की अध्यक्षता वाले समूह का कामकाज कुल मिलाकर बेकार की कवायद ही साबित हुई है। अतीत की घटनाओं के विस्तृत वर्णन के बाद, जो प्रबुद्ध तबके को पहले ही मालूम है, रिपोर्ट बस यह कहकर संतुष्ट हो जाती है कि स्वायत्तता की मांग की पड़ताल कश्मीर समझौता या किसी अन्य प्रकार या फिर वर्तमान प्रधानमंत्री को स्वायत्तता को पुनस्र्थापित करने में जो उचित लगे उस आधार पर की जा सकती है। यह भारतीय संविधान के किसी भी संघीय कानून या प्रावधान को हटाने या अन्यथा कोई अन्य विशेष अनुशंसा नहीं करती। तथाकथित रूप से संविधान के राज्य तक विस्तार के कारण ही कश्मीर को स्वायत्तता गंवानी पड़ी है। कश्मीर के मामले में जस्टिस सगीर अहमद की दुविधा समझ में आती है। अगर उन्होंने जम्मू-कश्मीर में संवैधानिक प्रावधानों के विस्तार की पड़ताल की होती तो उन्हें पता चलता कि समय-समय पर किए गए तमाम विस्तार न केवल कानूनी और संवैधानिक आधार पर, बल्कि संघ और राज्य के बीच मधुर कार्यकारी संबंध विकसित करने के लिए भी न्यायोचित थे। उन्हें यह भी पता चलता कि इनमें से किसी भी विस्तार ने किसी भी रूप में कश्मीर की पहचान या व्यक्तित्व, जिसे कश्मीरियत कहा जाता है, को नहीं घटाया है। इस प्रकार के निष्कर्ष निश्चित तौर पर जस्टिस सगीर अहमद को उन तत्वों का प्रिय नहीं बनाते जो अपने तुच्छ राजनीतिक स्वार्र्थो को पूरा करने के लिए कश्मीरी जनता की संवैधानिक निरक्षरता का लंबे समय से फायदा उठा रहे हैं। इसलिए उन्होंने कम से कम प्रतिरोध का रास्ता पकड़ा, जो असल मुद्दों से बचता हुआ निकल जाता है। साथ ही उन्होंने कोई ठोस सुझाव या अनुशंसा भी नहीं की है। उनकी रिपोर्ट से केंद्र या राज्य सरकार को व्यवहारिक नीति बनाने में शायद ही कोई दिशानिर्देश मिले। दुर्भाग्य से, कई सालों से निहित स्वार्थी तत्व कश्मीर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की गलत तस्वीर पेश कर रहे हैं। वे ठोस तथ्यों को छिपा रहे हैं और इस बात का कुप्रचार कर रहे हैं कि कश्मीर से स्वायत्तता का पूर्व में किया गया वायदा पूरा नहीं किया गया है। ये प्रयास सफल नहीं हुए हैं, किंतु ये आम कश्मीरी के मन में कुछ मुगालते भरने में कामयाब जरूर रहे हैं। यह सही समय है जब केंद्र सरकार को इन गलतफहमियों को दूर करने के लिए कदम उठाने चाहिए और इस मामले की पृष्ठभूमि के तथ्यों को खूब प्रचारित करना चाहिए। असलियत यह है कि जम्मू-कश्मीर राज्य और केंद्र के बीच कार्यकारी व्यवस्था के तहत 1952 में जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला ने आपसी विचार-विमर्श के आधार पर एक समझौता किया था, जिसे दिल्ली समझौता नाम दिया गया। इस समझौते के आलोक में ही भारत के राष्ट्रपति ने संविधान (जम्मू एवं कश्मीर पर लागू) आर्डर, 1954 जारी किया। इस आदेश में समय-समय पर संशोधन किए गए ताकि भारतीय संविधान के कुछ प्रावधान राज्य तक विस्तारित हो सकें। 1954 के राष्ट्रपति के आदेश से ही राज्य में वित्तीय एकीकरण प्रभावी हो पाया। तभी केंद्र सरकार का केंद्रीय उत्पाद शुल्क, डाकखानों और नागरिक उड्डयन पर नियंत्रण स्थापित हो पाया। कश्मीर के संबंध में नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक का अधिकार 1958 में मिला। 1960 में सुप्रीम कोर्ट को जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के फैसलों पर विशेष अनुमति याचिकाओं की सुनवाई की शक्तियां मिलीं। चुनाव आयोजित करने में चुनाव आयोग को निरीक्षक की भूमिका की भी अनुमति दे दी गई, यद्यपि वहां चुनाव राज्य के कानून के अनुसार होते रहे। 1965 में अनुच्छेद 356 और 357 जम्मू-कश्मीर में प्रभावी हुआ। 1968 में केंद्रीय अनुसूची में 72वीं प्रविष्टि की गई, जिसके तहत चुनावी याचिकाओं पर हाई कोर्ट के फैसले की सुनवाई का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को मिल गया। इन विस्तारों और अनुप्रयोगों के संदर्भ में सदरे-रियासत और जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री का पदनाम, दर्जा, कार्य और नियुक्ति की प्रक्रिया बेमानी हो गई। इसलिए यहां जरूरी और उचित समझा गया कि सदरे-रियासत और प्रधानमंत्री का पदनाम और नियुक्ति का तरीका बदला जाए। इस संबंध में जरूरी संशोधन 1966 में राज्य की विधानसभा ने खुद ही जम्मू एवं कश्मीर संविधान में संशोधन करके किया। आखिर इन सुधारों में क्या बुराई है? किस तरह ये आम कश्मीरी के हितों को नुकसान पहुंचाते हैं? ये तो राज्य की विधानसभा की सहमति से संवैधानिक, प्रशासनिक और वित्तीय व्यवस्था को सुचारू करते हैं। जो लोग इस आधार पर इन बदलावों को गलत ठहराते हैं कि परिदृश्य से शेख अब्दुल्ला की अनुपस्थिति से कश्मीरियों के हित प्रभावित हुए हैं, वे यह भूल जाते हैं कि इस संबंध में प्रासंगिक व्यक्ति विशेष नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारें हैं। संपत प्रकाश बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इन तमाम परिवर्तनों की संवैधानिक वैधानिकता पर मुहर लगा दी। कश्मीर संधि पर हस्ताक्षर करते समय इंदिरा गांधी ने 24 फरवरी, 1995 को संसद में दिए गए बयान में कहा था- शेख अब्दुल्ला को स्पष्ट कर दिया गया है कि घड़ी की सुइयां उल्टी नहीं घूमेंगी और केंद्र व राज्य के बीच के बंधनों में कोई कमजोरी नहीं आएगी। भारत सरकार केवल एक बिंदु पर विचार करने को सहमत हुई थी कि समवर्ती सूची में से किसी भी मामले पर अगर राज्य सरकार कोई प्रस्ताव भेजती है तो भारत सरकार उस पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगी, किंतु न तो शेख अब्दुल्ला और न ही फारुक अब्दुल्ला की सरकार ने केंद्र सरकार के विचारार्थ ऐसा कोई प्रस्ताव भेजा। कश्मीर संधि में पुनर्विचार के स्पष्ट प्रावधान के बावजूद फरवरी 1953 से 1975 तक किसी भी परिवर्तन का प्रस्ताव न भेजने का यह कारण था कि ये प्रावधान व्यवहारिक प्रयोजनों के लिए जरूरी थे और राज्य के आम आदमी के हितों से जुड़े थे। उदाहरण के लिए चुनाव आयोग के कार्याधिकार में विस्तार या सुप्रीम कोर्ट अथवा भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक के अधिकारों का दायरा बढ़ाने पर कोई आपत्ति कैसे दर्ज कराई जा सकती है? ये विस्तार तो सिर्फ इसलिए किए गए ताकि जम्मू-कश्मीर में न्यायिक तंत्र का बेहतर ढांचा स्थापित किया जा सके अथवा लेखा परीक्षण से संबंधित बेहतर प्रक्रिया उपलब्ध कराई जा सके या फिर चुनाव आयोजित करने के लिए एक अधिक स्वतंत्र इकाई इस राज्य में स्थापित की जा सके।