रविवार, 29 नवंबर 2009

कार्बन उत्सर्जन में कटौती

जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन में होने वाले सम्मेलन से पूर्व भारत ने अपनी कार्बन उत्सर्जन तीव्रता में 2020 तक 20 से 25 फीसदी कटौती का एकतरफा ऐलान किया। साथ ही साफ कर दिया कि कोपेनहेगन में वह लचीला रुख जरूर अपनाएगा मगर बेडि़यों में बांधने वाले किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेगा, न ही इसके लिए वह किसी समय सीमा पर विकसित देशों के दबाव के आगे झुकेगा। भारत ने यह भी कहा है कि घरेलू उत्सर्जन नियंत्रण कार्यक्रम किसी अंतरराष्ट्रीय निगरानी के लिए नहीं खोले जाएंगे। वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने लोकसभा में भारत के रुख की घोषणा करते हुए कहा, कोपेनहेगन में देश के हित व अस्मिता से समझौते की आशंका बेमानी है। कार्बन उत्सर्जन पर किसी गैर बराबरी वाली संधि की कानूनी बंदिशों को हम स्वीकार नहीं करेंगे। हां इतना जरूर है कि जलवायु परितर्वन की चुनौतियों और इसके खतरों को देखते हुए कहेंगे कि भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उ‌र्त्सजन विकसित देशों से कम रहेगा। जयराम ने कहा, कुछ देश इस प्रयास में लगे हैं कि भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश अपने कार्बन उत्सर्जन के चोटी पर पहंुचने की कोई समय सीमा तय कर लें, लेकिन भारत इस पर भी कोई समझौता नहीं करेगा। हम पर्यावरणीय अनुकूल तकनीक से विकास दर के अनुपात में कार्बन उत्सर्जन कम करेंगे। 1990 से 2005 के दौरान हमने उत्सर्जन दर में 17.6 फीसदी तक कमी की है। पर्यावरण मंत्री ने सांसदों की इस आशंका को निराधार बताया कि अमेरिका व विकसित देशों के दबाव में भारत अपने हितों की कुर्बानी देने जा रहा है। उनका कहना था कि भारत वैश्विक नेतृत्व के लिए तैयार है और ऐसे में उसे लीडरशिप दिखाते हुए अपनी तरफ से पहल करनी है। ताकि हम अमेरिका सहित तमाम विकसित देशों पर उत्सर्जन कम करने का नैतिक दबाव डाल अपना हित सुरक्षित रखें। इसलिए अब भारत केवल इसकी दुहाई नहीं दे सकता कि हमारा प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन तो विकसित देशों के मुकाबले एक चौथाई से भी कम है। जयराम ने कहा कि इस सकारात्मक व लचीले रुख के जरिए भारत कोपनहेगन में चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को साथ लेकर विकासशील देशों के साथ-साथ सबसे सर्वोपरि अपने हित को देखेगा।




कार्बन उत्सर्जन में कटौती की घोषणा कर भारत ने अपने रुख को लेकर उपजे संशय को तो दूर कर दिया, लेकिन यह कहना कठिन है कि भारत सरकार का यह निर्णय कोपेनहेगन सम्मेलन की सफलता में सहायक बन सकेगा। भले ही यह रेखांकित किया जाए कि वर्ष 2020 तक 20 से 25 प्रतिशत तक कटौती की भारत सरकार की घोषणा स्वैच्छिक है, लेकिन प्रतीत यही हो रहा है कि यह उस दबाव का परिणाम है जो अमेरिका और चीन की ऐसी ही घोषणाओं के चलते भारत पर बन गया था। कार्बन उत्सर्जन में कटौती की घोषणा करते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने जिस तरह यह कहा कि भारत कोपेनहेगन में अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत कानूनी बाध्यता वाले उत्सर्जन कटौती के किसी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेगा उससे कुल मिलाकर यही संकेत मिल रहा है कि यह सम्मेलन असफलता की ओर बढ़ रहा है। जयराम रमेश की घोषणा यह भी बता रही है कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती के मामले में विकसित और विकासशील देशों के बीच पाले खिंच गए हैं। इस पर आश्चर्य नहीं कि पर्यावरण विशेषज्ञों का एक समूह कोपेनहेगन सम्मेलन को विफल होते हुए देख रहा है। कुछ विशेषज्ञों का तो यह भी कहना है कि कोपेनहेगन सम्मेलन में उत्सर्जन कटौती के जो लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं वे बुनियादी तौर पर गलत हैं। वस्तुस्थिति जो भी हो, कार्बन उत्सर्जन में कटौती के मामले में विकासशील देशों को एकजुट रखने की भारत की कोशिश सफल होती नहीं दिख रही है, क्योंकि चीन के अलावा अन्य विकासशील देश अपनी-अपनी तरह से कार्बन उत्सर्जन की तीव्रता कम करने की पेशकश कर रहे हैं। यह विचित्र है कि भारत यह मान रहा है कि जलवायु परिवर्तन से वह कहीं अधिक प्रभावित होगा, लेकिन उसकी ओर से ऐसी कोई पहल नहीं की जा सकी जिससे कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने पर वैश्विक स्तर पर कोई साझा समझबूझ विकसित हो पाती। यह निराशाजनक है कि कोपेनहेगन सम्मेलन जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है उसकी सफलता को लेकर संदेह गहरा रहा है। ऐसा लगता है कि अपने-अपने हितों की रक्षा के फेर में भारत के साथ-साथ अन्य प्रमुख देश यह देखने से इनकार कर रहे हैं कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती की घोषणाओं का जलवायु पर कोई सकारात्मक प्रभाव पड़ने वाला है या नहीं, क्योंकि अभी तक कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की जो घोषणाएं की गई हैं वे जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को रोकने में नाकाम ही नजर आती हैं। यदि सभी देश कार्बन उत्सर्जन में कटौती की अपनी घोषणाओं पर वास्तव में अमल करते हैं तो भी वर्ष 2040 तक कुल कार्बन उत्सर्जन 1990 के स्तर के मुकाबले दो गुना होगा। इस संदर्भ में इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि कुछ वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी दी है कि भले ही कोपेनहेगन सम्मेलन में कार्बन उत्सर्जन के संदर्भ में किसी वैश्विक संधि पर सहमति बन जाए, लेकिन इससे तापमान में वृद्धि के खतरे समाप्त नहीं हो जाते। यह निराशाजनक है कि जब उम्मीद की जा रही थी कि भारत जलवायु परिवर्तन को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम होगा तब वह रक्षात्मक रवैया अपनाने के लिए विवश होता दिख रहा है




कोपेनहेगेन सम्मेलन के पूर्व कार्बन उत्सर्जन में कटौती को लेकर विकसित देश जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को रोकने के स्थान पर जिस तरह अपने-अपने हितों की रक्षा के लिए लामबंद हो गए हैं उससे एक ओर जहां भ्रम का वातावरण बना है वहीं दूसरी ओर उत्सर्जन नियंत्रण के लिए किसी न्यायसंगत व्यवस्था के निर्माण की संभावनाएं भी कम हो गई हैं। अमेरिका और चीन ने स्वेच्छा से कार्बन उत्सर्जन में कटौती की घोषणा कर दी। इस घोषणा का इसलिए कोई मूल्य नहीं, क्योंकि इन दोनों देशों ने वर्ष 2005 को आधार बनाकर कार्बन उत्सर्जन में कटौती की घोषणा की है, जबकि क्योटो प्रोटोकाल के अनुसार आधार वर्ष 1990 होना चाहिए था। अमेरिका और चीन जिस पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं उसे देखते हुए उनकी ओर से जो घोषणा की गई है वह दिखावटी ही अधिक है। इन घोषणाओं का मूल उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन में कटौती की किसी तार्किक व्यवस्था का निर्माण करने के स्थान पर वाहवाही लूटना और अन्य देशों पर अनुचित दबाव बनाना है। यह शुभ संकेत है कि राष्ट्रमंडल सम्मेलन में मनमोहन सिंह ने ऐसे किसी दबाव का प्रतिकार करने के स्पष्ट संकेत दिए, लेकिन भारत अपनी कोशिश में तभी सफल हो सकता है जब कार्बन उत्सर्जन में कटौती को लेकर विकासशील देश एकजुट बने रहें। फिलहाल यह कहना कठिन है कि यह एकजुटता बरकरार रहेगी या नहीं, क्योंकि इस मामले में जहां भारत और चीन एकजुट दिख रहे हैं वहीं वन एवं पर्यावरण मंत्री यह स्पष्ट नहीं कर पा रहे हैं कि उनका एजेंडा क्या है? भले ही जलवायु परिवर्तन पर भारत के दूत की भूमिका निभा रहे श्याम सरन यह कह रहे हों कि औद्योगिक देशों का भारत पर कोई दबाव नहीं है, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि किसी न किसी स्तर पर दबाव तो है ही और इसका प्रमाण खुद वन एवं पर्यावरण मंत्री की ओर से लिखे गए उस पत्र से मिलता है जिसमें कार्बन उत्सर्जन में कटौती के संदर्भ में नीति बदलने की जरूरत जताई गई थी। फिलहाल यह कहना कठिन है कि भारत अंतत: किस नतीजे पर पहुंचेगा, लेकिन यह समय की मांग है कि ऐसे प्रयास गंभीरता से किए जाएं जिनसे कोपेनहेगन सम्मेलन को सफल बनाया जा सके। यदि यह सम्मेलन असफल होता है तो इसके दुष्परिणाम भारत सरीखे देशों को ही भुगतने पड़ेंगे। एक ऐसे समय जब जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव सामने आ चुके हैं और तत्काल प्रभाव से कुछ करने की आवश्यकता है तब भारत को न केवल प्रभावी भूमिका निभाने के लिए तैयार रहना चाहिए, बल्कि अपने हितों की रक्षा के लिए भी। यह सही है कि जलवायु परिवर्तन के लिए मुख्य रूप से विकसित देश जिम्मेदार हैं, लेकिन अब इस तर्क का कोई विशेष मूल्य नहीं कि विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन में विशेष रियायत मिलनी चाहिए। आखिर जब ऐसी तकनीक उपलब्ध है जिससे आर्थिक विकास पर अंकुश लगाए बगैर कार्बन उत्सर्जन में कटौती की जा सकती है तब फिर कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि विकासशील देश विकसित देशों से वह तकनीक हासिल कर सकें जो कार्बन उत्सर्जन में नियंत्रण में सहायक हो।

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