शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009
भारत अमेरिका संबन्ध
ओबामा के शुरुआती बयानों ने कुछ निराश भी किया था, क्योंकि उन बयानों का थोड़ा झुकाव पाकिस्तान और चीन के साथ था, लेकिन पिछले दिनों जो कुछ ओबामा ने किया उससे सारी दुविधा खत्म हो गई। आज ओबामा और मनमोहन सिंह के रिश्ते वैसे ही हैं जैसे बुश-मनमोहन के थे। ओबामा ने राष्ट्रपति बनने के बाद पहला बड़ा भोज व्हाइट हाउस के अंदर अगर किसी शासनाध्यक्ष के लिए दिया तो वह भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सम्मान में था। यही नहीं जो वार्ता दोनों नेताओं के बीच हुई उसमें वे सारे विषय भारत की शर्ताे के हिसाब से विचार के लिए आए जिन पर अभी तक अमेरिका बचता रहा है। उदाहरण के लिए दोनों की बातचीत में यह विषय भी आया कि पाकिस्तान के अंदर जो आतंकवादी अड्डे बने हैं उनका क्या किया जाए? अफगानिस्तान, अमेरिका और भारत, इन तीन के हितों का त्रिकोण कैसे बनाया जाए? ये विषय कुछ ऐसे रहे हैं जिन पर अमेरिका खुलकर नहीं बोलता था। अमेरिका खुद तो पाकिस्तान के अंदर मिसाइल के जरिए आतंकवादी अड्डों को समाप्त करने का काम एक साल से करता आ रहा है, लेकिन इस मुद्दे पर उसने कभी भारत से कोई बातचीत नहीं की। यदि विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के संसद में दिए गए बयान को देखा जाए तो उसमें साफ कहा गया है कि भारत और अमेरिका ने मिलकर आतंकवाद से लड़ने का फैसला किया है और उसमें अफगानिस्तान व पाकिस्तान के अंदर आतंकवादियों के जो अड्डे बन गए हैं वे भी शामिल हैं। हमारे कुछ समाजवादी व वामपंथी मित्रों को भारत की अमेरिका से दोस्ती पर आदतन ऐतराज हो सकता है। 1970 के दशक में अमेरिका विरोध प्रबल था और भारत ने कड़ा रुख भी लिया था। भारत-सोवियत मैत्री चरमोत्कर्ष पर थी और इस समय वह विरोध स्वाभाविक भी था। एक दौर था जब इस देश में बड़े घरों के लड़के और लड़कियों को कम्युनिस्ट बनने का फैशन सवार था। वामपंथी आंदोलन में भाषण ऐसे होते थे कि लोग सहज में आकृष्ट हो जाते थे। धीरे-धीरे वह सब कुछ समाप्त होता गया। कम्युनिस्ट आंदोलन वक्त के साथ विचार न बदलने के कारण इतिहास के गर्त में डूबता चला गया। आज मुश्किल से कोई नौजवान वामपंथी बनने को तैयार होता है। समय के साथ अमेरिका विरोध भी कम होता गया। और तो और सोवियत संघ खुद अमेरिका का मित्र बन बैठा और चीन अमेरिका का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी। आज चीन की कंपनियां सबसे ज्यादा काम अमेरिका में कर रही हैं और अमेरिकी कंपनियों को चीन पलक-पांवड़े बिछा कर अपने यहां सुविधाएं दे रहा है। किसी ने सोचा भी नहीं था कि इतनी जल्दी विश्व की राजनीति में यह उलट-पुलट हो जाएगा। बड़े-बड़े इस्लामी देश अमेरिका के गुट में सबसे वफादारों के रूप में शामिल हो गए। जब विश्व में दो गुट बचे ही नहीं और दूसरे गुट का नेता रूस ही अमेरिका का हमदर्द हो गया तो भारत जैसे देश के सामने कौन सा विकल्प बचा था। आजादी के बाद लंबे वक्त तक भारत अमेरिका के रिश्ते बहुत अच्छे रहे थे। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का अच्छा स्वागत अमेरिका में हुआ था। राष्ट्रपति जानसन ने तो इंदिरा गांधी को बेहद सम्मान दिया था। सारी बात दो राष्ट्रपतियों के दौरान बिगड़ी-एक कैनेडी और दूसरे निक्सन। इनके रुख और व्यवहार भारत के लिए अच्छे नहीं थे। जब क्लिंटन राष्ट्रपति बनकर आए तो अपने कार्यकाल की समाप्ति से दो साल पहले उन्हें भारत की अच्छाई समझ में आई। वे खुद यहां आए और उन्होंने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लिए व्हाइट हाउस में भोज भी दिया। अमेरिका के साथ रिश्तों में जमी बर्फ को निक्सन के दौर के बाद अगर किसी ने पिघलाया था तो वह राजीव गांधी थे। वह अमेरिका गए और व्हाइट हाउस में उनका भव्य स्वागत हुआ। उन्होंने ही वहां इस रिश्ते को दोबारा शुरू किया। दुर्भाग्य यह रहा कि उसके बाद आए प्रधानमंत्रियों-वी पी सिंह, चंद्रशेखर, नरसिंह राव, देवगौड़ा और गुजराल को अमेरिका ने ज्यादा महत्व नहीं दिया। राव से क्लिंटन की एक मुलाकात के दौरान मैं भी उस कमरे में व्हाइट हाउस में मौजूद था। उस बातचीत में मुझे लगा कि क्लिंटन सिर्फ औपचारिकता निभा रहे थे। वह राव से न ज्यादा बात कर रहे थे और न ही उनकी सुन रहे थे। उस दिन कैनेडी की पत्नी का निधन हुआ था और वह वही बात सबसे कर रहे थे। अपने कार्यकाल के आखिर में उन्हें अमेरिका में बसे भारतीयों और स्ट्रोब टाल्बोट जैसे मित्रों की वजह से भारत समझ में आया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह चले गए और दोस्ती के पैगाम के अलावा भारत को कुछ न दे सके। इसके बाद आए बुश और उन्होंने धीरे-धीरे भारत के महत्व को समझा। उनकी मनमोहन सिंह से ऐसी पटी कि सबका विरोध झेलकर अपने देश के अंदर के विरोध को भी नकार कर उन्होंने भारत को परमाणु समझौते के रूप में तोहफा दिया। रात में भी जागकर वह भारत के समर्थन में तमाम राष्ट्राध्यक्षों को फोन करते थे और भारत के लिए परमाणु ऊर्जा एजेंसी में समर्थन जुटाते थे। बड़े ताज्जुब की बात थी कि अमेरिका का राष्ट्रपति सिर्फ भारत के लिए अमेरिकी संसद में नए कानून बनाने की लड़ाई लड़ रहा था और उसमें सफल हुआ। भारत को जो डील मिली वह विश्व के किसी भी देश को नहीं मिली। पाकिस्तान तड़पता रहा, लेकिन अमेरिका टस से मस नहीं हुआ। बुश भारत भी आए, भारत के समर्थन में बोले और जाते-जाते अमेरिकी सरकार के अंदर तीस साल से जमी भारत विरोधी भावना को जड़ से साफ कर गए। सीआईए ने धीरे-धीरे भारत विरोधी भावना को पूरे तंत्र में भर दिया था। अब एक नहीं तमाम विषयों पर भारत-अमेरिका एक साथ हैं, इसीलिए राष्ट्रपति बनने के बाद जिन पहले शासनाध्यक्ष का ओबामा ने स्वागत किया वह भारत के प्रधानमंत्री थे। उनके साथ व्यापार, पूंजी निवेश, ऊर्जा सहयोग, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, अंतरिक्ष, उच्च तकनीक सहित हर मामले पर सहयोग का नया अध्याय खुला। परमाणु समझौते को अब और आगे बढ़ाने का फैसला लिया गया है। आतंकवाद पर मिलकर लड़ने के संकल्प के साथ-साथ दोनों देशों की सेनाओं में सहयोग का द्वार खोला गया। भारतीय विश्वविद्यालयों में अमेरिकी सहयोग से नई पहल का पहली बार रास्ता खुला। इसके लिए अमेरिका शुरुआत में ही पचास करोड़ रुपये दे रहा है। एक सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की विरासत वाली पुरानी चीजों का पेटेंट अमेरिकी कंपनियां ले रही थीं, जिनमें नीम और हल्दी तक शामिल थी। मनमोहन सिंह ने इस मुद्दे को उठाया और अमेरिका इस पर तैयार हो गया कि यह नहीं होने पाएगा और एक ज्ञान कोष शुरू होगा जिसमें भारतीय चीजों का ब्यौरा रहेगा ताकि उनको कोई पेटेंट न करा सके।
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