शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

जज के खिलाफ महाभियोग

राज्यसभा में 75 संसद सदस्यों ने जस्टिस दिनकरण के खिलाफ महाभियोग लाने का प्रस्ताव उपराष्ट्रपति को दिया है। हालांकि ये सभी सदस्य विपक्षी दलों के हैं, लेकिन इनमें भाजपा और वामपंथी दोनों शामिल हैं। सत्तारूढ़ वर्ग में भी इसको लेकर चर्चा जारी है। तमाम सदस्यों की यह कहना है कि इस मामले पर अंतरआत्मा की आवाज पर वोट देने की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। कई सदस्यों का यह भी मानना है कि एक बार संसद को अपनी शक्ति का अहसास न्यायपालिका को कराना जरूरी है। यदि एक जज के खिलाफ महाभियोग पारित हो जाता है तो कोई भी जज भ्रष्टाचार करने से पहले चार बार सोचेगा और इससे ईमानदार जजों की छवि भी खराब नहीं होगी। संसद में केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने घोषणा की है कि वह जल्दी ही न्यायाधीश मानक एवं जवाबदेही विधेयक लाने वाले हैं। उनके मुताबिक इस विधेयक के अंदर ऐसे प्रावधान किए जाएंगे जिनसे अयोग्य व्यक्ति जज नहीं बन पाएगा। यदि कोई व्यक्ति जज बनने के बाद भ्रष्टाचार या अनुचित कार्य करने लगता है तो उसकी जवाबदेही भी इस विधेयक में सुनिश्चित की जाएगी। ऐसे व्यक्ति को कड़ी सजा देने या हटाने के बंदोबस्त होंगे। नेता विपक्ष का यह कहना था कि यह अजीब मजाक है कि जज ही जज की नियुक्ति कर रहा है जबकि अन्य किसी क्षेत्र में ऐसा नहीं होता है। इस बात पर उनका कहना था कि जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका अर्थात सरकार का भी दखल होना चाहिए। सरकारी छानबीन से जो जज बनते हैं वे ज्यादा बेहतर होते हैं और पिछले साठ सालों में यह साबित भी हो चुका है। ऐसे में भाई-भतीजावाद और सिफारिश नहीं चल पाती हंै। कंपटीशन बिल पर बहस में भी संसद में सभी दलों के सदस्यों ने यह कहा कि कंपटीशन आयोग के साथ-साथ अपीलेट अथारिटी बनाने का कोई मतलब नहीं था और सिर्फ रिटायर जजों को नौकरी देने के लिए ऐसी अथारिटी बनाई जा रही है। इस अथारिटी में पिछले एक साल में एक भी काम नहीं था, एक भी केस नहीं था, एक भी फाइल नहीं थी। सिर्फ रिटायर जज वेतन लेते रहे, भत्ते लेते रहे, कार-बंगला आदि की सुविधाएं भोगते रहे। उनका कहना था कि जज किसी वकील से जनहित याचिका दाखिल कराकर सरकार पर दबाव डलवाते हैं कि इस तरह की अथारिटी या आयोग बनाए जाएं और इनमें किसी न किसी रिटायर जज को बिठाया जाए। सुप्रीम कोर्ट का शायद ही कोई जज हो जो रिटायरमेंट के बाद किसी न किसी पद पर न बैठा हो। इस तरह के विचार व्यक्त करते हुए संसद के दोनों सदनों में सदस्यों ने सरकार से कहा कि अब इस तरह का काम बंद होना चाहिए और आम जनता की गाढ़ी कमाई का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। पिछले कुछ समय से जजों को लेकर तरह-तरह की बातें मीडिया और संसद में कही जा रही हैं जो किसी भी तरह ईमानदार जजों के लिए उचित नहीं हंै। न्यायपालिका की पवित्रता बनाए रखने के लिए यह बहुत जरूरी है कि गलत लोग जज न बन पाएं और एक मछली को भी तालाब गंदा करने का अवसर न दिया जाए। अच्छी बात यह है कि ज्यादातर जज और सर्वोच्च न्यायालय के अधिकांश जजों ने न्यायपालिका में पवित्रता बनाए रखने और भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम उठाने की पुरजोर वकालत की है। यह एक शुभ लक्षण है। ऐसे में दिनकरण के मामले में न्यायपालिका का सहयोग समाज के जागरूक बुद्धिजीवियों द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन को मिलेगा। दिनकरण पर आरोप हैं कि उन्होंने तमिलनाडु में बेहिसाब जमीन खरीदी और तमिलनाडु के भूमि कानूनों का भी जमकर उल्लंघन किया। दूसरी ओर दिनकरण ने अपने बचाव में कहा है कि वह पैसे वाले व्यक्ति हैं इसलिए उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लग ही नहीं सकते। उन्होंने कहा कि उन्हें पैसे की जरूरत ही नहीं है। दिनकरण पर तमिलनाडु में सात सौ एकड़ जमीन खरीदने का आरोप है और एक दिलचस्प आरोप यह भी है कि उन्होंने एक घंटे में पांच सौ लोगों को जमानत दे दी। दिनकरण का यह भी दावा है कि उन्होंने पच्चीस दिन में सवा दो लाख केस निपटा दिए। एक जज पच्चीस दिन में सवा दो लाख केस की फाइल भी नहीं पढ़ सकता है। इन सब आरोपों को देखते हुए देश की जानी-मानी हस्तियों, जिनमें शांतिभूषण, प्रशांत भूषण, अनिल दीवान, फली नरीमन आदि शामिल हैं, ने हंगामा खड़ा कर दिया। वे एक स्वर में दिनकरण को हटाने की मांग कर रहे हैं। ये लोग भारत के मुख्य न्यायाधीश से भी टकराने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। कर्नाटक बार एसोसिएशन ने भी दिनकरण की अदालत का बहिष्कार शुरू कर दिया है। अब उनका सुप्रीम कोर्ट में आना तो रुक गया है, लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट में अभी भी वह मुख्य न्यायाधीश बने हुए हैं जो उचित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के भी तमाम जजों का यह मानना है कि उनका जमकर मीडिया ट्रायल हो चुका है और इस हालत में इतनी फजीहत के बाद उनका अपने पद पर बने रहना न्यायपालिका की साख के लिए अच्छा नहीं है। इसके पहले कि संसद द्वारा उन्हें हटाया जाए, बेहतर होगा वह खुद ही पद छोड़ दें। दिनकरण के करीबी सूत्रों का मानना है कि वह अपनी जिद पर अड़े हुए हैं और किसी भी हालत में पद छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। यदि एक बार वह संसद से बच जाते हैं तब भी उनकी छवि इतनी बिगड़ गई है कि उनके हर फैसले पर शक किया जाएगा। यही नहीं, बड़े-बड़े वकील उनके विरुद्ध आंदोलन जारी रखेंगे। ऐसे में शायद ही कोई महत्वपूर्ण मुकदमा उनकी अदालत में जा पाए। एक जज की सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति को लेकर ऐसा ही मसला आज से सात साल पहले आया था, जिसमें अनेक न्यायाधीश उस जज को पूरा समर्थन दे रहे थे। खुफिया विभाग की रिपोर्ट भी उस जज के खिलाफ थी तथा तमाम संगठनों ने उसे भ्रष्ट जज बताया था। उसकी भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश से काफी पटती थी इसलिए तत्कालीन कानून मंत्री और प्रधानमंत्री की विपरीत टिप्पणियों के बावजूद मुख्य न्यायाधीश अड़े रहे और उन्होंने उसकी फाइल राष्ट्रपति के पास भिजवा दी। तत्कालीन राष्ट्रपति ने उस पर कानून मंत्री को बुलाकर विचार-विमर्श किया और फाइल वापस मुख्य न्यायाधीश के पास पुनर्विचार के लिए भेज दी। पता नहीं राष्ट्रपति की भावनाओं को समझने के बावजूद उस समय के मुख्य न्यायाधीश क्यों उस जज पर इतना मेहरबान थे कि उन्होंने दोबारा उसी फाइल को अपनी सिफारिश के साथ राष्ट्रपति को भिजवा दिया। राष्ट्रपति ने उस पर दस्तखत कर दिए क्योंकि वह नियमानुसार बाध्य थे, लेकिन तक तक मुख्य न्यायाधीश रिटायर हो गए। नए मुख्य न्यायाधीश के रूप में जो सज्जन आए और उन्होंने उस जज को ज्वाइन नहीं करने दिया। इस तरह से एक बड़ा विवाद टल गया, लेकिन जिद पर अड़े रहने के कारण न्यायपालिका की साख पर जरूर असर पड़ा। न्यायाधीशों से आग्रह है कि व्यक्तिगत रिश्तों के चलते वे गलत व्यक्ति का समर्थन न करें।

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