रविवार, 1 जून 2014

पीएमओ

- कहते हैं कि देश पीएमओ से चलता है। वाकई यहां से सब मंत्रालयों पर नजर रखी जाती है। पीएमओ साउथ ब्लॉक में है, जहां उसके हिस्से कुल 20 कमरे हैं। ये तमाम आधुनिक सुविधाओं से लैस हैं। पीएमओ में देश के प्रधानमंत्री के दो सबसे अहम ऑफिसर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और प्रिंसिपल सेक्रटरी के अलावा, तमाम दूसरे ऑफिसर होते हैं। नरेंद्र मोदी ने अजीत डोभाल को अपना राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया है। आमतौर पर इस पद पर प्रधानमंत्री अपने बेहद खासमखास शख्स को रखते हैं। एक ऐसा शख्स, जिसे सुरक्षा संबंधी मामलों की गहरी समझ हो। दूसरी ओर, प्रिंसिपल सेक्रटरी खांटी ब्यूरोक्रेट होता है, जिसे ब्यूरोक्रेसी का लंबा अनुभव होता है। वह सभी मंत्रालयों के काम-काज की जानकारी प्रधानमंत्री को देता है। उसके साथ खासा स्टाफ रहता है।
- पीएमओ में प्रधानमंत्री के प्राइवेट सेक्रटरी, मीडिया अडवाइज़र समेत बड़ी संख्या में स्टाफ होते हैं। आप पीएमओ को प्रधानमंत्री का सचिवालय भी कह सकते हैं। पीएमओ में भ्रष्टाचार निरोधक इकाई भी काम करती है। यहां पर जनता के मसलों को सुनने के लिए एक अलग से विभाग है। वास्तव में प्रधानमंत्री अपने इसी दफ्तर के जरिए अपनी सरकार के तमाम मंत्रालयों और गवर्नरों के काम-काज पर नजर रखते हैं।

- जिन विभागों को प्रधानमंत्री देख रहे होते हैं, उनसे संबंधित संसद में पूछे जाने वाले सवालों के जवाब भी पीएमओ में ही तैयार होते हैं। इन्हें उस विभाग के राज्य मंत्री के सहयोग से पीएमओ में तैयार किया जाता है। जिन सवालों के जवाब संसद में प्रधानमंत्री को देने होते हैं, उन्हें वह खुद पीएमओ में पहले देखते भी हैं। इसके अलावा, पीएमओ से ही प्रधानमंत्री राहत कोष और राष्ट्रीय सुरक्षा कोष भी चलता है। यानी देश पीएमओ के हिसाब से ही चलता है।

- हैरानी की बात यह है कि इस जमाने में भी पीएमओ को रोजाना करीब दो हजार खत आते हैं। इनमें से 75 प्रतिशत पोस्ट कार्ड होते हैं। पहले प्रधानमंत्री के पास आने वाले सारे पत्र निर्माण भवन के डाकघर में आते थे,लेकिन अब पीएमओ में एक डाकघर भी काम करने लगा है।

- चूंकि पीएमओ के ऊपर काफी व्यापक जिम्मेदारियां होती हैं, इसलिए देश के आम बजट में इसके लिए अलग से रकम तय की जाती है। 2013-14 के आम बजट में पीएमओ के लिए 32.22 करोड़ रुपए रखे गए। महाराष्ट्र कैडर के पूर्व आईएएस ऑफिसर जफर इकबाल कहते हैं कि पीएमओ के पास तमाम तरह के काम होते हैं। ऐसे में यह रकम कोई बहुत नहीं मानी जा सकती।

शनिवार, 30 जनवरी 2010

न्याय व्यवस्था में सुधार

वीरप्पा मोइली नि:संदेह प्रशंसा के पात्र हैं। उन्होंने एक ऐसा महत्वपूर्ण फैसला लिया है जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है। मोइली का यह निर्णय स्वागत योग्य है कि देश में डेढ़ लाख विचाराधीन कैदियों को जेलों से रिहा किया जाएगा। जिन्हें जेलों की हालत पता नहीं है वह मधुर भंडारकर की फिल्म जेल देख लें। सालों से तमाम ऐसे कैदी देश की जेलों मंें बंद हैं जिनका अपराध छोटा-मोटा है, लेकिन वकील न कर पाने के कारण अथवा अदालतों में देरी से सुनवाई के कारण या फिर पैरवी के लिए कोई न होने के कारण जेलों में सड़ रहे हैं। हजारों कैदी तो ऐसे हैं जो अपने अपराध के लिए कानून में निर्धारित सजा से ज्यादा दिन काट चुके हैं, मगर पैरवी के अभाव में तथा अदालतों के ढीले रवैये के कारण जेलों में पड़े हैं। अस्सी-अस्सी एवं नब्बे-नब्बे साल के बुजुर्ग पड़े हुए हैं। अदालतें बेपरवाह हैं, जजों को फिक्र नहीं है कि कौन कितने साल से जेल में सड़ रहा है। इन सबके लिए एक सहारा बनकर कानून मंत्री मोइली और मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन सामने आए हैं। यदि डेढ़ लाख कैदी छह महीने के अंदर छूट जाते हैं तो जेलों का बोझ बहुत कम हो जाएगा। मोइली इस काम के लिए कितने गंभीर हैं, इसका अंदाजा इस बात से ही लगता है कि उन्होंने दिल्ली में स्वयं एक विशेष अदालत में जाकर दर्शक दीर्घा में बैठकर मजिस्ट्रेट का हौसला बढ़ाया और उस मजिस्ट्रेट ने एक दिन में लगभग 40 केसों का निपटारा किया तथा 58 कैदियों को जेल से बाहर किया। यह अभियान अपने स्तर पर हर जिला जज को अपनी अदालतों में चलवाना चाहिए। हाईकोर्ट को भी तत्काल इस काम पर लग जाना चाहिए। जेल विभाग को भी नरमी अपनानी चाहिए तथा जल्दी से जल्दी ऐसे कैदियों की सूची बनानी चाहिए जिन्हें छोड़ा जा सकता है। लाखों परिवारों की जिंदगी गलत न्याय प्रक्रिया और जेलों की लापरवाही के कारण तबाह हो चुकी हैं। मेरा राज्य सरकारों से आग्रह है कि वे तत्काल जेलों के लिए भारी धनराशि का आवंटन करें, जिससे नई बैरक बनाई जा सके। पर्याप्त संख्या में शौचालय और स्नानागार बनवाए जा सकें। एक व्यक्ति को जिंदा रहने के लिए जो सामान्य सुविधाएं दी जानी चाहिए, कम से कम वे तो दी जाएं। पंखों का इंतजाम बैरक में होना चाहिए। खाना-पीना सामान्य तो होना ही चाहिए। सांसदों, विधायकों से भी आग्रह है कि अपनी निधि से इन कामों के लिए जेलों को पैसा देना चाहिए। एक व्यक्ति से यदि अपराध हुआ है तो उसे सजा मिल रही है, लेकिन उसे सामान्य ढंग से जिंदा रहने का अधिकार जेलों के अंदर भी दिया गया है। कम से कम उतना बंदोबस्त तो होना चाहिए। राज्यपालों से भी अनुरोध है कि जो राज्य सरकारें कैदियों की रिहाई का प्रस्ताव भेजती हैं उसे वे तत्काल स्वीकार कर हजारों परिवारों की जिंदगी में रोशनी लाएं। इस मामले में अदालतों को विशेष रूप से पहल करनी होगी। अदालतों में मुकदमों का असहनीय बोझ इस मामले में सबसे बड़ा बाधक है। आंकड़ों के मुताबिक नवंबर, 1999 तक देश की सबसे बड़ी अदालत में 20307 मुकदमें लंबित पड़े थे। जाहिर है अब ग्यारह साल से ज्यादा समय बीतने के बाद इसमें इजाफा ही हुआ होगा। इसी तरह दिसंबर 1998 तक विभिन्न हाईकोर्ट में तकरीबन 32 लाख मुकदमे लंबित पड़े थे, जबकि निचली अदालतों में 2 करोड़ से भी ज्यादा मामले लंबित थे। अब इसमें अगर इनकम टैक्स और विदेशी मुद्रा कानून के उल्लंघन को जोड़ा जाए तो इनसे संबंधित मामलों की संख्या भी लाखों में है। देश में देरी से न्याय मिलने का आलम यह है कि वर्षो तक कैदी जेल में सड़ते रहते हैं और उन्हें न्याय नहीं मिल पाता। इस संदर्भ में जांच एजेंसियां जो भी मामले दर्ज करती हैं उनमें सिर्फ छह फीसदी ही निपट पाते हैं। एक आकलन के मुताबिक औसतन हत्या के एक मामले के निपटारे में बीस साल लग जाते हैं। दहेज हत्या के झूठे मामलों में लोग दस-दस साल से सजा काट रहे हैं। अभी जितने मुकदमे लंबित पड़े हैं, उन्हें निपटाने के लिए पांच हजार कोर्ट तो बनाने ही पड़ेंगे, लेकिन सिर्फ यही एक विकल्प नहीं है। हमें मौजूदा न्याय व्यवस्था में भी कई सुधार करने पड़ेंगे। इसके तहत अदालती छुट्टियों की तादाद कम करनी पड़ेगी। एक साल में एक न्यायाधीश को कितने मामले निपटाने चाहिए, इसकी एक न्यूनतम सीमा तय की जानी चाहिए। वादी को उस मामले में दंडित किया जाना चाहिए जब वह सबूत को न जुटा पाए, लेकिन मामले को चालू रखना चाहिए। इसी तरह हल्के-फुल्के मामलों से संबंधित मुकदमों में तत्काल सुनवाई एवं उसी समय निपटारा करने का प्रयोग करना चाहिए।

कार्यकारी समूह की रिपोर्ट

जस्टिस सगीर अहमद की अध्यक्षता में कश्मीर कार्यकारी समूह की रिपोर्ट से एक बार फिर कश्मीर की स्वायत्तता का मुद्दा सुर्खियों में आ गया है। इस समूह के गठन की घोषणा 24 और 25 मई 2006 को श्रीनगर में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की थी। सगीर अहमद आयोग की ओर से ढाई साल बाद जो रिपोर्ट पेश की गई वह आकार में जितनी मोटी है, मामले की पड़ताल में उतनी ही हल्की है। असलियत में सगीर अहमद की अध्यक्षता वाले समूह का कामकाज कुल मिलाकर बेकार की कवायद ही साबित हुई है। अतीत की घटनाओं के विस्तृत वर्णन के बाद, जो प्रबुद्ध तबके को पहले ही मालूम है, रिपोर्ट बस यह कहकर संतुष्ट हो जाती है कि स्वायत्तता की मांग की पड़ताल कश्मीर समझौता या किसी अन्य प्रकार या फिर वर्तमान प्रधानमंत्री को स्वायत्तता को पुनस्र्थापित करने में जो उचित लगे उस आधार पर की जा सकती है। यह भारतीय संविधान के किसी भी संघीय कानून या प्रावधान को हटाने या अन्यथा कोई अन्य विशेष अनुशंसा नहीं करती। तथाकथित रूप से संविधान के राज्य तक विस्तार के कारण ही कश्मीर को स्वायत्तता गंवानी पड़ी है। कश्मीर के मामले में जस्टिस सगीर अहमद की दुविधा समझ में आती है। अगर उन्होंने जम्मू-कश्मीर में संवैधानिक प्रावधानों के विस्तार की पड़ताल की होती तो उन्हें पता चलता कि समय-समय पर किए गए तमाम विस्तार न केवल कानूनी और संवैधानिक आधार पर, बल्कि संघ और राज्य के बीच मधुर कार्यकारी संबंध विकसित करने के लिए भी न्यायोचित थे। उन्हें यह भी पता चलता कि इनमें से किसी भी विस्तार ने किसी भी रूप में कश्मीर की पहचान या व्यक्तित्व, जिसे कश्मीरियत कहा जाता है, को नहीं घटाया है। इस प्रकार के निष्कर्ष निश्चित तौर पर जस्टिस सगीर अहमद को उन तत्वों का प्रिय नहीं बनाते जो अपने तुच्छ राजनीतिक स्वार्र्थो को पूरा करने के लिए कश्मीरी जनता की संवैधानिक निरक्षरता का लंबे समय से फायदा उठा रहे हैं। इसलिए उन्होंने कम से कम प्रतिरोध का रास्ता पकड़ा, जो असल मुद्दों से बचता हुआ निकल जाता है। साथ ही उन्होंने कोई ठोस सुझाव या अनुशंसा भी नहीं की है। उनकी रिपोर्ट से केंद्र या राज्य सरकार को व्यवहारिक नीति बनाने में शायद ही कोई दिशानिर्देश मिले। दुर्भाग्य से, कई सालों से निहित स्वार्थी तत्व कश्मीर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की गलत तस्वीर पेश कर रहे हैं। वे ठोस तथ्यों को छिपा रहे हैं और इस बात का कुप्रचार कर रहे हैं कि कश्मीर से स्वायत्तता का पूर्व में किया गया वायदा पूरा नहीं किया गया है। ये प्रयास सफल नहीं हुए हैं, किंतु ये आम कश्मीरी के मन में कुछ मुगालते भरने में कामयाब जरूर रहे हैं। यह सही समय है जब केंद्र सरकार को इन गलतफहमियों को दूर करने के लिए कदम उठाने चाहिए और इस मामले की पृष्ठभूमि के तथ्यों को खूब प्रचारित करना चाहिए। असलियत यह है कि जम्मू-कश्मीर राज्य और केंद्र के बीच कार्यकारी व्यवस्था के तहत 1952 में जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला ने आपसी विचार-विमर्श के आधार पर एक समझौता किया था, जिसे दिल्ली समझौता नाम दिया गया। इस समझौते के आलोक में ही भारत के राष्ट्रपति ने संविधान (जम्मू एवं कश्मीर पर लागू) आर्डर, 1954 जारी किया। इस आदेश में समय-समय पर संशोधन किए गए ताकि भारतीय संविधान के कुछ प्रावधान राज्य तक विस्तारित हो सकें। 1954 के राष्ट्रपति के आदेश से ही राज्य में वित्तीय एकीकरण प्रभावी हो पाया। तभी केंद्र सरकार का केंद्रीय उत्पाद शुल्क, डाकखानों और नागरिक उड्डयन पर नियंत्रण स्थापित हो पाया। कश्मीर के संबंध में नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक का अधिकार 1958 में मिला। 1960 में सुप्रीम कोर्ट को जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के फैसलों पर विशेष अनुमति याचिकाओं की सुनवाई की शक्तियां मिलीं। चुनाव आयोजित करने में चुनाव आयोग को निरीक्षक की भूमिका की भी अनुमति दे दी गई, यद्यपि वहां चुनाव राज्य के कानून के अनुसार होते रहे। 1965 में अनुच्छेद 356 और 357 जम्मू-कश्मीर में प्रभावी हुआ। 1968 में केंद्रीय अनुसूची में 72वीं प्रविष्टि की गई, जिसके तहत चुनावी याचिकाओं पर हाई कोर्ट के फैसले की सुनवाई का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को मिल गया। इन विस्तारों और अनुप्रयोगों के संदर्भ में सदरे-रियासत और जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री का पदनाम, दर्जा, कार्य और नियुक्ति की प्रक्रिया बेमानी हो गई। इसलिए यहां जरूरी और उचित समझा गया कि सदरे-रियासत और प्रधानमंत्री का पदनाम और नियुक्ति का तरीका बदला जाए। इस संबंध में जरूरी संशोधन 1966 में राज्य की विधानसभा ने खुद ही जम्मू एवं कश्मीर संविधान में संशोधन करके किया। आखिर इन सुधारों में क्या बुराई है? किस तरह ये आम कश्मीरी के हितों को नुकसान पहुंचाते हैं? ये तो राज्य की विधानसभा की सहमति से संवैधानिक, प्रशासनिक और वित्तीय व्यवस्था को सुचारू करते हैं। जो लोग इस आधार पर इन बदलावों को गलत ठहराते हैं कि परिदृश्य से शेख अब्दुल्ला की अनुपस्थिति से कश्मीरियों के हित प्रभावित हुए हैं, वे यह भूल जाते हैं कि इस संबंध में प्रासंगिक व्यक्ति विशेष नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारें हैं। संपत प्रकाश बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इन तमाम परिवर्तनों की संवैधानिक वैधानिकता पर मुहर लगा दी। कश्मीर संधि पर हस्ताक्षर करते समय इंदिरा गांधी ने 24 फरवरी, 1995 को संसद में दिए गए बयान में कहा था- शेख अब्दुल्ला को स्पष्ट कर दिया गया है कि घड़ी की सुइयां उल्टी नहीं घूमेंगी और केंद्र व राज्य के बीच के बंधनों में कोई कमजोरी नहीं आएगी। भारत सरकार केवल एक बिंदु पर विचार करने को सहमत हुई थी कि समवर्ती सूची में से किसी भी मामले पर अगर राज्य सरकार कोई प्रस्ताव भेजती है तो भारत सरकार उस पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगी, किंतु न तो शेख अब्दुल्ला और न ही फारुक अब्दुल्ला की सरकार ने केंद्र सरकार के विचारार्थ ऐसा कोई प्रस्ताव भेजा। कश्मीर संधि में पुनर्विचार के स्पष्ट प्रावधान के बावजूद फरवरी 1953 से 1975 तक किसी भी परिवर्तन का प्रस्ताव न भेजने का यह कारण था कि ये प्रावधान व्यवहारिक प्रयोजनों के लिए जरूरी थे और राज्य के आम आदमी के हितों से जुड़े थे। उदाहरण के लिए चुनाव आयोग के कार्याधिकार में विस्तार या सुप्रीम कोर्ट अथवा भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक के अधिकारों का दायरा बढ़ाने पर कोई आपत्ति कैसे दर्ज कराई जा सकती है? ये विस्तार तो सिर्फ इसलिए किए गए ताकि जम्मू-कश्मीर में न्यायिक तंत्र का बेहतर ढांचा स्थापित किया जा सके अथवा लेखा परीक्षण से संबंधित बेहतर प्रक्रिया उपलब्ध कराई जा सके या फिर चुनाव आयोजित करने के लिए एक अधिक स्वतंत्र इकाई इस राज्य में स्थापित की जा सके। 

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

जज के खिलाफ महाभियोग

राज्यसभा में 75 संसद सदस्यों ने जस्टिस दिनकरण के खिलाफ महाभियोग लाने का प्रस्ताव उपराष्ट्रपति को दिया है। हालांकि ये सभी सदस्य विपक्षी दलों के हैं, लेकिन इनमें भाजपा और वामपंथी दोनों शामिल हैं। सत्तारूढ़ वर्ग में भी इसको लेकर चर्चा जारी है। तमाम सदस्यों की यह कहना है कि इस मामले पर अंतरआत्मा की आवाज पर वोट देने की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। कई सदस्यों का यह भी मानना है कि एक बार संसद को अपनी शक्ति का अहसास न्यायपालिका को कराना जरूरी है। यदि एक जज के खिलाफ महाभियोग पारित हो जाता है तो कोई भी जज भ्रष्टाचार करने से पहले चार बार सोचेगा और इससे ईमानदार जजों की छवि भी खराब नहीं होगी। संसद में केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने घोषणा की है कि वह जल्दी ही न्यायाधीश मानक एवं जवाबदेही विधेयक लाने वाले हैं। उनके मुताबिक इस विधेयक के अंदर ऐसे प्रावधान किए जाएंगे जिनसे अयोग्य व्यक्ति जज नहीं बन पाएगा। यदि कोई व्यक्ति जज बनने के बाद भ्रष्टाचार या अनुचित कार्य करने लगता है तो उसकी जवाबदेही भी इस विधेयक में सुनिश्चित की जाएगी। ऐसे व्यक्ति को कड़ी सजा देने या हटाने के बंदोबस्त होंगे। नेता विपक्ष का यह कहना था कि यह अजीब मजाक है कि जज ही जज की नियुक्ति कर रहा है जबकि अन्य किसी क्षेत्र में ऐसा नहीं होता है। इस बात पर उनका कहना था कि जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका अर्थात सरकार का भी दखल होना चाहिए। सरकारी छानबीन से जो जज बनते हैं वे ज्यादा बेहतर होते हैं और पिछले साठ सालों में यह साबित भी हो चुका है। ऐसे में भाई-भतीजावाद और सिफारिश नहीं चल पाती हंै। कंपटीशन बिल पर बहस में भी संसद में सभी दलों के सदस्यों ने यह कहा कि कंपटीशन आयोग के साथ-साथ अपीलेट अथारिटी बनाने का कोई मतलब नहीं था और सिर्फ रिटायर जजों को नौकरी देने के लिए ऐसी अथारिटी बनाई जा रही है। इस अथारिटी में पिछले एक साल में एक भी काम नहीं था, एक भी केस नहीं था, एक भी फाइल नहीं थी। सिर्फ रिटायर जज वेतन लेते रहे, भत्ते लेते रहे, कार-बंगला आदि की सुविधाएं भोगते रहे। उनका कहना था कि जज किसी वकील से जनहित याचिका दाखिल कराकर सरकार पर दबाव डलवाते हैं कि इस तरह की अथारिटी या आयोग बनाए जाएं और इनमें किसी न किसी रिटायर जज को बिठाया जाए। सुप्रीम कोर्ट का शायद ही कोई जज हो जो रिटायरमेंट के बाद किसी न किसी पद पर न बैठा हो। इस तरह के विचार व्यक्त करते हुए संसद के दोनों सदनों में सदस्यों ने सरकार से कहा कि अब इस तरह का काम बंद होना चाहिए और आम जनता की गाढ़ी कमाई का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। पिछले कुछ समय से जजों को लेकर तरह-तरह की बातें मीडिया और संसद में कही जा रही हैं जो किसी भी तरह ईमानदार जजों के लिए उचित नहीं हंै। न्यायपालिका की पवित्रता बनाए रखने के लिए यह बहुत जरूरी है कि गलत लोग जज न बन पाएं और एक मछली को भी तालाब गंदा करने का अवसर न दिया जाए। अच्छी बात यह है कि ज्यादातर जज और सर्वोच्च न्यायालय के अधिकांश जजों ने न्यायपालिका में पवित्रता बनाए रखने और भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम उठाने की पुरजोर वकालत की है। यह एक शुभ लक्षण है। ऐसे में दिनकरण के मामले में न्यायपालिका का सहयोग समाज के जागरूक बुद्धिजीवियों द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन को मिलेगा। दिनकरण पर आरोप हैं कि उन्होंने तमिलनाडु में बेहिसाब जमीन खरीदी और तमिलनाडु के भूमि कानूनों का भी जमकर उल्लंघन किया। दूसरी ओर दिनकरण ने अपने बचाव में कहा है कि वह पैसे वाले व्यक्ति हैं इसलिए उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लग ही नहीं सकते। उन्होंने कहा कि उन्हें पैसे की जरूरत ही नहीं है। दिनकरण पर तमिलनाडु में सात सौ एकड़ जमीन खरीदने का आरोप है और एक दिलचस्प आरोप यह भी है कि उन्होंने एक घंटे में पांच सौ लोगों को जमानत दे दी। दिनकरण का यह भी दावा है कि उन्होंने पच्चीस दिन में सवा दो लाख केस निपटा दिए। एक जज पच्चीस दिन में सवा दो लाख केस की फाइल भी नहीं पढ़ सकता है। इन सब आरोपों को देखते हुए देश की जानी-मानी हस्तियों, जिनमें शांतिभूषण, प्रशांत भूषण, अनिल दीवान, फली नरीमन आदि शामिल हैं, ने हंगामा खड़ा कर दिया। वे एक स्वर में दिनकरण को हटाने की मांग कर रहे हैं। ये लोग भारत के मुख्य न्यायाधीश से भी टकराने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। कर्नाटक बार एसोसिएशन ने भी दिनकरण की अदालत का बहिष्कार शुरू कर दिया है। अब उनका सुप्रीम कोर्ट में आना तो रुक गया है, लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट में अभी भी वह मुख्य न्यायाधीश बने हुए हैं जो उचित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के भी तमाम जजों का यह मानना है कि उनका जमकर मीडिया ट्रायल हो चुका है और इस हालत में इतनी फजीहत के बाद उनका अपने पद पर बने रहना न्यायपालिका की साख के लिए अच्छा नहीं है। इसके पहले कि संसद द्वारा उन्हें हटाया जाए, बेहतर होगा वह खुद ही पद छोड़ दें। दिनकरण के करीबी सूत्रों का मानना है कि वह अपनी जिद पर अड़े हुए हैं और किसी भी हालत में पद छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। यदि एक बार वह संसद से बच जाते हैं तब भी उनकी छवि इतनी बिगड़ गई है कि उनके हर फैसले पर शक किया जाएगा। यही नहीं, बड़े-बड़े वकील उनके विरुद्ध आंदोलन जारी रखेंगे। ऐसे में शायद ही कोई महत्वपूर्ण मुकदमा उनकी अदालत में जा पाए। एक जज की सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति को लेकर ऐसा ही मसला आज से सात साल पहले आया था, जिसमें अनेक न्यायाधीश उस जज को पूरा समर्थन दे रहे थे। खुफिया विभाग की रिपोर्ट भी उस जज के खिलाफ थी तथा तमाम संगठनों ने उसे भ्रष्ट जज बताया था। उसकी भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश से काफी पटती थी इसलिए तत्कालीन कानून मंत्री और प्रधानमंत्री की विपरीत टिप्पणियों के बावजूद मुख्य न्यायाधीश अड़े रहे और उन्होंने उसकी फाइल राष्ट्रपति के पास भिजवा दी। तत्कालीन राष्ट्रपति ने उस पर कानून मंत्री को बुलाकर विचार-विमर्श किया और फाइल वापस मुख्य न्यायाधीश के पास पुनर्विचार के लिए भेज दी। पता नहीं राष्ट्रपति की भावनाओं को समझने के बावजूद उस समय के मुख्य न्यायाधीश क्यों उस जज पर इतना मेहरबान थे कि उन्होंने दोबारा उसी फाइल को अपनी सिफारिश के साथ राष्ट्रपति को भिजवा दिया। राष्ट्रपति ने उस पर दस्तखत कर दिए क्योंकि वह नियमानुसार बाध्य थे, लेकिन तक तक मुख्य न्यायाधीश रिटायर हो गए। नए मुख्य न्यायाधीश के रूप में जो सज्जन आए और उन्होंने उस जज को ज्वाइन नहीं करने दिया। इस तरह से एक बड़ा विवाद टल गया, लेकिन जिद पर अड़े रहने के कारण न्यायपालिका की साख पर जरूर असर पड़ा। न्यायाधीशों से आग्रह है कि व्यक्तिगत रिश्तों के चलते वे गलत व्यक्ति का समर्थन न करें।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि योजना

 केंद्र सरकार ने सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि योजना में भ्रष्टाचार के आरोपों को नकारते हुए सुप्रीम कोर्ट को खूबियां गिनाई हैं। सरकार ने कहा है कि पारदर्शिता व जवाबदेही योजना की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। इसमें सांसदों की भूमिका केवल सिफारिश तक सीमित है, निगरानी और सुधार के तमाम उपायों के साथ क्रियान्वयन का अधिकार जिला प्रशासन के पास होता है। योजना को सूचना कानून के तहत लाया गया है और इसके खर्च का ब्योरा ऑनलाइन देखा जा सकता है। ये सारी बातें सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कही हैं। सरकार ने कहा है कि सांसद निधि योजना के तहत सांसदों को दो करोड़ रुपये के आवंटन से भ्रष्टाचार को बढ़ावे के आरोप निराधार हैं। धन चुनाव क्षेत्र के ढांचागत विकास के लिए दिया जाता है। सांसद तो सिर्फ काम की सिफारिश करते हैं, तकनीकी वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार तो जिला प्रशासन के पास होते हैं। केंद्र व राज्य सरकारें जिला प्रशासन के काम की निगरानी करती हैं और क्रियान्वयन में खामी पर तुरंत कार्रवाई होती है। सरकार ने कहा है कि गत वर्ष के खर्च का उपयोग प्रमाणपत्र व उसके भी एक साल पहले का ऑडिट प्रमाणपत्र देखने के बाद ही आगे का धन जारी किया जाता है। कार्यदाई संस्था के लिए प्रशासन को काम पूरा होने की रिपोर्ट देना भी अनिवार्य कर दिया गया है। पारदर्शिता के लिए योजना के क्रियान्वयन को सूचना अधिकार के दायरे में लाया गया है। योजना में निगरानी के लिए कई साल पहले ही एक साफ्टवेयर विकसित किया गया था जिसमें एक लाख रुपये तक के काम का ब्योरा डाला जाता है जिसे ऑन लाइन देखा जा सकता है

छोटे राज्यों की मांग

तेलंगाना राज्य के गठन का रास्ता खोलने की केंद्र की घोषणा ने हरित प्रदेश, बुंदलेखंड व विदर्भ जैसे छोटे राज्यों की मांग को हवा दे दी है। टीआरएस के आंदोलन के आगे केंद्र के कंधा झुकाने से उन दलों को नई ऊर्जा मिलेगी जो अलग प्रदेश का सपना दिखाकर क्षेत्र विशेष में सियासत सींच रहे हैं। केंद्र चाहे तेलंगाना के मामले को दूसरे नए राज्यों की मांग से अलग ठहराए, मगर ताजा घटनाक्रम से छोटे राज्यों की सियासत करने वाले दलों को आधार तो मिल ही गया है। कुछ रणनीतिकार मानते भी हैं कि कुछ हद तक छोटे राज्यों की मांग की सियासत जोर पकड़ेगी। इनमें विदर्भ, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड और गोरखालैंड की मांग सबसे मुखर होने का खतरा है। तेलंगाना के बाद सबसे पुरानी मांग महाराष्ट्र से अलग नए विदर्भ राज्य की रही है। कांग्रेस और भाजपा दोनों अलग विदर्भ से सहमत हैं। अकेले शिवसेना ही खिलाफ है, लेकिन विदर्भ के पक्ष या विपक्ष में जो एक अहम बात है वह किसी क्षेत्रीय पार्टी का न होना। उत्तरप्रदेश के पश्चिमी हिस्से को हरित प्रदेश बनाने का एजेंडा रालोद नेता अजित सिंह की सियासत की बुनियाद है। गन्ना किसानों के ताजा आंदोलन की कामयाबी से गदगद अजित के लिए यह मुद्दा छींका टूटने से कम नहीं है,मगर सपा और बसपा इसके हक में नहीं। कांग्रेस व भाजपा भी बंटवारे की हिमायती नहीं। फिर भी अजित की हरित प्रदेश की उम्मीदें हिलोरें मार सकती हैं। यानि केंद्र पर दबाव डालो और राज्य निर्माण का रास्ता खोलो। बुंदेलखंड की मांग वहां की जनता से ज्यादा सियासी दलों की है। यूपी-एमपी के इलाकों को मिलाकर इस नए राज्य की मांग से तो कांग्रेस भी सहानुभूति रखती है। इनके अलावा चौथा मजबूत दावा गोरखालैंड का है। इसको लेकर दशकों से आंदोलन होते रहे हैं और गोरखा पर्वतीय परिषद का गठन भी हो चुका है। इस मांग से न पश्चिम बंगाल की मुख्य सत्ताधारी पार्टी माकपा इत्तेफाक रखती और न ही कांग्रेस, लेकिन गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने नए राज्य की लौ नहीं बुझने दी। अब उसकी उम्मीदों के दीये में भी तेलंगाना ने और तेल डाल दिया है। नए राज्यों की अन्य मांगें उतनी गंभीर नहीं हैं। इसमें यूपी में पूर्वाचल तो बिहार में मिथिलांचल और भोजपुर बनाने की मांगें शामिल हैं। गुजरात में अलग सौराष्ट्र प्रदेश बनाने की भी यदा-कदा आवाज उठती है,मगर इनकी गंभीरता कभी नहीं रही, लेकिन तेलंगाना के बाद इन आवाजों को ताकत मिलेगी।

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

भारत अमेरिका संबन्ध

ओबामा के शुरुआती बयानों ने कुछ निराश भी किया था, क्योंकि उन बयानों का थोड़ा झुकाव पाकिस्तान और चीन के साथ था, लेकिन पिछले दिनों जो कुछ ओबामा ने किया उससे सारी दुविधा खत्म हो गई। आज ओबामा और मनमोहन सिंह के रिश्ते वैसे ही हैं जैसे बुश-मनमोहन के थे। ओबामा ने राष्ट्रपति बनने के बाद पहला बड़ा भोज व्हाइट हाउस के अंदर अगर किसी शासनाध्यक्ष के लिए दिया तो वह भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सम्मान में था। यही नहीं जो वार्ता दोनों नेताओं के बीच हुई उसमें वे सारे विषय भारत की शर्ताे के हिसाब से विचार के लिए आए जिन पर अभी तक अमेरिका बचता रहा है। उदाहरण के लिए दोनों की बातचीत में यह विषय भी आया कि पाकिस्तान के अंदर जो आतंकवादी अड्डे बने हैं उनका क्या किया जाए? अफगानिस्तान, अमेरिका और भारत, इन तीन के हितों का त्रिकोण कैसे बनाया जाए? ये विषय कुछ ऐसे रहे हैं जिन पर अमेरिका खुलकर नहीं बोलता था। अमेरिका खुद तो पाकिस्तान के अंदर मिसाइल के जरिए आतंकवादी अड्डों को समाप्त करने का काम एक साल से करता आ रहा है, लेकिन इस मुद्दे पर उसने कभी भारत से कोई बातचीत नहीं की। यदि विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के संसद में दिए गए बयान को देखा जाए तो उसमें साफ कहा गया है कि भारत और अमेरिका ने मिलकर आतंकवाद से लड़ने का फैसला किया है और उसमें अफगानिस्तान व पाकिस्तान के अंदर आतंकवादियों के जो अड्डे बन गए हैं वे भी शामिल हैं। हमारे कुछ समाजवादी व वामपंथी मित्रों को भारत की अमेरिका से दोस्ती पर आदतन ऐतराज हो सकता है। 1970 के दशक में अमेरिका विरोध प्रबल था और भारत ने कड़ा रुख भी लिया था। भारत-सोवियत मैत्री चरमोत्कर्ष पर थी और इस समय वह विरोध स्वाभाविक भी था। एक दौर था जब इस देश में बड़े घरों के लड़के और लड़कियों को कम्युनिस्ट बनने का फैशन सवार था। वामपंथी आंदोलन में भाषण ऐसे होते थे कि लोग सहज में आकृष्ट हो जाते थे। धीरे-धीरे वह सब कुछ समाप्त होता गया। कम्युनिस्ट आंदोलन वक्त के साथ विचार न बदलने के कारण इतिहास के गर्त में डूबता चला गया। आज मुश्किल से कोई नौजवान वामपंथी बनने को तैयार होता है। समय के साथ अमेरिका विरोध भी कम होता गया। और तो और सोवियत संघ खुद अमेरिका का मित्र बन बैठा और चीन अमेरिका का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी। आज चीन की कंपनियां सबसे ज्यादा काम अमेरिका में कर रही हैं और अमेरिकी कंपनियों को चीन पलक-पांवड़े बिछा कर अपने यहां सुविधाएं दे रहा है। किसी ने सोचा भी नहीं था कि इतनी जल्दी विश्व की राजनीति में यह उलट-पुलट हो जाएगा। बड़े-बड़े इस्लामी देश अमेरिका के गुट में सबसे वफादारों के रूप में शामिल हो गए। जब विश्व में दो गुट बचे ही नहीं और दूसरे गुट का नेता रूस ही अमेरिका का हमदर्द हो गया तो भारत जैसे देश के सामने कौन सा विकल्प बचा था। आजादी के बाद लंबे वक्त तक भारत अमेरिका के रिश्ते बहुत अच्छे रहे थे। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का अच्छा स्वागत अमेरिका में हुआ था। राष्ट्रपति जानसन ने तो इंदिरा गांधी को बेहद सम्मान दिया था। सारी बात दो राष्ट्रपतियों के दौरान बिगड़ी-एक कैनेडी और दूसरे निक्सन। इनके रुख और व्यवहार भारत के लिए अच्छे नहीं थे। जब क्लिंटन राष्ट्रपति बनकर आए तो अपने कार्यकाल की समाप्ति से दो साल पहले उन्हें भारत की अच्छाई समझ में आई। वे खुद यहां आए और उन्होंने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लिए व्हाइट हाउस में भोज भी दिया। अमेरिका के साथ रिश्तों में जमी बर्फ को निक्सन के दौर के बाद अगर किसी ने पिघलाया था तो वह राजीव गांधी थे। वह अमेरिका गए और व्हाइट हाउस में उनका भव्य स्वागत हुआ। उन्होंने ही वहां इस रिश्ते को दोबारा शुरू किया। दुर्भाग्य यह रहा कि उसके बाद आए प्रधानमंत्रियों-वी पी सिंह, चंद्रशेखर, नरसिंह राव, देवगौड़ा और गुजराल को अमेरिका ने ज्यादा महत्व नहीं दिया। राव से क्लिंटन की एक मुलाकात के दौरान मैं भी उस कमरे में व्हाइट हाउस में मौजूद था। उस बातचीत में मुझे लगा कि क्लिंटन सिर्फ औपचारिकता निभा रहे थे। वह राव से न ज्यादा बात कर रहे थे और न ही उनकी सुन रहे थे। उस दिन कैनेडी की पत्नी का निधन हुआ था और वह वही बात सबसे कर रहे थे। अपने कार्यकाल के आखिर में उन्हें अमेरिका में बसे भारतीयों और स्ट्रोब टाल्बोट जैसे मित्रों की वजह से भारत समझ में आया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह चले गए और दोस्ती के पैगाम के अलावा भारत को कुछ न दे सके। इसके बाद आए बुश और उन्होंने धीरे-धीरे भारत के महत्व को समझा। उनकी मनमोहन सिंह से ऐसी पटी कि सबका विरोध झेलकर अपने देश के अंदर के विरोध को भी नकार कर उन्होंने भारत को परमाणु समझौते के रूप में तोहफा दिया। रात में भी जागकर वह भारत के समर्थन में तमाम राष्ट्राध्यक्षों को फोन करते थे और भारत के लिए परमाणु ऊर्जा एजेंसी में समर्थन जुटाते थे। बड़े ताज्जुब की बात थी कि अमेरिका का राष्ट्रपति सिर्फ भारत के लिए अमेरिकी संसद में नए कानून बनाने की लड़ाई लड़ रहा था और उसमें सफल हुआ। भारत को जो डील मिली वह विश्व के किसी भी देश को नहीं मिली। पाकिस्तान तड़पता रहा, लेकिन अमेरिका टस से मस नहीं हुआ। बुश भारत भी आए, भारत के समर्थन में बोले और जाते-जाते अमेरिकी सरकार के अंदर तीस साल से जमी भारत विरोधी भावना को जड़ से साफ कर गए। सीआईए ने धीरे-धीरे भारत विरोधी भावना को पूरे तंत्र में भर दिया था। अब एक नहीं तमाम विषयों पर भारत-अमेरिका एक साथ हैं, इसीलिए राष्ट्रपति बनने के बाद जिन पहले शासनाध्यक्ष का ओबामा ने स्वागत किया वह भारत के प्रधानमंत्री थे। उनके साथ व्यापार, पूंजी निवेश, ऊर्जा सहयोग, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, अंतरिक्ष, उच्च तकनीक सहित हर मामले पर सहयोग का नया अध्याय खुला। परमाणु समझौते को अब और आगे बढ़ाने का फैसला लिया गया है। आतंकवाद पर मिलकर लड़ने के संकल्प के साथ-साथ दोनों देशों की सेनाओं में सहयोग का द्वार खोला गया। भारतीय विश्वविद्यालयों में अमेरिकी सहयोग से नई पहल का पहली बार रास्ता खुला। इसके लिए अमेरिका शुरुआत में ही पचास करोड़ रुपये दे रहा है। एक सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की विरासत वाली पुरानी चीजों का पेटेंट अमेरिकी कंपनियां ले रही थीं, जिनमें नीम और हल्दी तक शामिल थी। मनमोहन सिंह ने इस मुद्दे को उठाया और अमेरिका इस पर तैयार हो गया कि यह नहीं होने पाएगा और एक ज्ञान कोष शुरू होगा जिसमें भारतीय चीजों का ब्यौरा रहेगा ताकि उनको कोई पेटेंट न करा सके।