शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009
भारत अमेरिका संबन्ध
ओबामा के शुरुआती बयानों ने कुछ निराश भी किया था, क्योंकि उन बयानों का थोड़ा झुकाव पाकिस्तान और चीन के साथ था, लेकिन पिछले दिनों जो कुछ ओबामा ने किया उससे सारी दुविधा खत्म हो गई। आज ओबामा और मनमोहन सिंह के रिश्ते वैसे ही हैं जैसे बुश-मनमोहन के थे। ओबामा ने राष्ट्रपति बनने के बाद पहला बड़ा भोज व्हाइट हाउस के अंदर अगर किसी शासनाध्यक्ष के लिए दिया तो वह भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सम्मान में था। यही नहीं जो वार्ता दोनों नेताओं के बीच हुई उसमें वे सारे विषय भारत की शर्ताे के हिसाब से विचार के लिए आए जिन पर अभी तक अमेरिका बचता रहा है। उदाहरण के लिए दोनों की बातचीत में यह विषय भी आया कि पाकिस्तान के अंदर जो आतंकवादी अड्डे बने हैं उनका क्या किया जाए? अफगानिस्तान, अमेरिका और भारत, इन तीन के हितों का त्रिकोण कैसे बनाया जाए? ये विषय कुछ ऐसे रहे हैं जिन पर अमेरिका खुलकर नहीं बोलता था। अमेरिका खुद तो पाकिस्तान के अंदर मिसाइल के जरिए आतंकवादी अड्डों को समाप्त करने का काम एक साल से करता आ रहा है, लेकिन इस मुद्दे पर उसने कभी भारत से कोई बातचीत नहीं की। यदि विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के संसद में दिए गए बयान को देखा जाए तो उसमें साफ कहा गया है कि भारत और अमेरिका ने मिलकर आतंकवाद से लड़ने का फैसला किया है और उसमें अफगानिस्तान व पाकिस्तान के अंदर आतंकवादियों के जो अड्डे बन गए हैं वे भी शामिल हैं। हमारे कुछ समाजवादी व वामपंथी मित्रों को भारत की अमेरिका से दोस्ती पर आदतन ऐतराज हो सकता है। 1970 के दशक में अमेरिका विरोध प्रबल था और भारत ने कड़ा रुख भी लिया था। भारत-सोवियत मैत्री चरमोत्कर्ष पर थी और इस समय वह विरोध स्वाभाविक भी था। एक दौर था जब इस देश में बड़े घरों के लड़के और लड़कियों को कम्युनिस्ट बनने का फैशन सवार था। वामपंथी आंदोलन में भाषण ऐसे होते थे कि लोग सहज में आकृष्ट हो जाते थे। धीरे-धीरे वह सब कुछ समाप्त होता गया। कम्युनिस्ट आंदोलन वक्त के साथ विचार न बदलने के कारण इतिहास के गर्त में डूबता चला गया। आज मुश्किल से कोई नौजवान वामपंथी बनने को तैयार होता है। समय के साथ अमेरिका विरोध भी कम होता गया। और तो और सोवियत संघ खुद अमेरिका का मित्र बन बैठा और चीन अमेरिका का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी। आज चीन की कंपनियां सबसे ज्यादा काम अमेरिका में कर रही हैं और अमेरिकी कंपनियों को चीन पलक-पांवड़े बिछा कर अपने यहां सुविधाएं दे रहा है। किसी ने सोचा भी नहीं था कि इतनी जल्दी विश्व की राजनीति में यह उलट-पुलट हो जाएगा। बड़े-बड़े इस्लामी देश अमेरिका के गुट में सबसे वफादारों के रूप में शामिल हो गए। जब विश्व में दो गुट बचे ही नहीं और दूसरे गुट का नेता रूस ही अमेरिका का हमदर्द हो गया तो भारत जैसे देश के सामने कौन सा विकल्प बचा था। आजादी के बाद लंबे वक्त तक भारत अमेरिका के रिश्ते बहुत अच्छे रहे थे। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का अच्छा स्वागत अमेरिका में हुआ था। राष्ट्रपति जानसन ने तो इंदिरा गांधी को बेहद सम्मान दिया था। सारी बात दो राष्ट्रपतियों के दौरान बिगड़ी-एक कैनेडी और दूसरे निक्सन। इनके रुख और व्यवहार भारत के लिए अच्छे नहीं थे। जब क्लिंटन राष्ट्रपति बनकर आए तो अपने कार्यकाल की समाप्ति से दो साल पहले उन्हें भारत की अच्छाई समझ में आई। वे खुद यहां आए और उन्होंने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लिए व्हाइट हाउस में भोज भी दिया। अमेरिका के साथ रिश्तों में जमी बर्फ को निक्सन के दौर के बाद अगर किसी ने पिघलाया था तो वह राजीव गांधी थे। वह अमेरिका गए और व्हाइट हाउस में उनका भव्य स्वागत हुआ। उन्होंने ही वहां इस रिश्ते को दोबारा शुरू किया। दुर्भाग्य यह रहा कि उसके बाद आए प्रधानमंत्रियों-वी पी सिंह, चंद्रशेखर, नरसिंह राव, देवगौड़ा और गुजराल को अमेरिका ने ज्यादा महत्व नहीं दिया। राव से क्लिंटन की एक मुलाकात के दौरान मैं भी उस कमरे में व्हाइट हाउस में मौजूद था। उस बातचीत में मुझे लगा कि क्लिंटन सिर्फ औपचारिकता निभा रहे थे। वह राव से न ज्यादा बात कर रहे थे और न ही उनकी सुन रहे थे। उस दिन कैनेडी की पत्नी का निधन हुआ था और वह वही बात सबसे कर रहे थे। अपने कार्यकाल के आखिर में उन्हें अमेरिका में बसे भारतीयों और स्ट्रोब टाल्बोट जैसे मित्रों की वजह से भारत समझ में आया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह चले गए और दोस्ती के पैगाम के अलावा भारत को कुछ न दे सके। इसके बाद आए बुश और उन्होंने धीरे-धीरे भारत के महत्व को समझा। उनकी मनमोहन सिंह से ऐसी पटी कि सबका विरोध झेलकर अपने देश के अंदर के विरोध को भी नकार कर उन्होंने भारत को परमाणु समझौते के रूप में तोहफा दिया। रात में भी जागकर वह भारत के समर्थन में तमाम राष्ट्राध्यक्षों को फोन करते थे और भारत के लिए परमाणु ऊर्जा एजेंसी में समर्थन जुटाते थे। बड़े ताज्जुब की बात थी कि अमेरिका का राष्ट्रपति सिर्फ भारत के लिए अमेरिकी संसद में नए कानून बनाने की लड़ाई लड़ रहा था और उसमें सफल हुआ। भारत को जो डील मिली वह विश्व के किसी भी देश को नहीं मिली। पाकिस्तान तड़पता रहा, लेकिन अमेरिका टस से मस नहीं हुआ। बुश भारत भी आए, भारत के समर्थन में बोले और जाते-जाते अमेरिकी सरकार के अंदर तीस साल से जमी भारत विरोधी भावना को जड़ से साफ कर गए। सीआईए ने धीरे-धीरे भारत विरोधी भावना को पूरे तंत्र में भर दिया था। अब एक नहीं तमाम विषयों पर भारत-अमेरिका एक साथ हैं, इसीलिए राष्ट्रपति बनने के बाद जिन पहले शासनाध्यक्ष का ओबामा ने स्वागत किया वह भारत के प्रधानमंत्री थे। उनके साथ व्यापार, पूंजी निवेश, ऊर्जा सहयोग, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, अंतरिक्ष, उच्च तकनीक सहित हर मामले पर सहयोग का नया अध्याय खुला। परमाणु समझौते को अब और आगे बढ़ाने का फैसला लिया गया है। आतंकवाद पर मिलकर लड़ने के संकल्प के साथ-साथ दोनों देशों की सेनाओं में सहयोग का द्वार खोला गया। भारतीय विश्वविद्यालयों में अमेरिकी सहयोग से नई पहल का पहली बार रास्ता खुला। इसके लिए अमेरिका शुरुआत में ही पचास करोड़ रुपये दे रहा है। एक सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की विरासत वाली पुरानी चीजों का पेटेंट अमेरिकी कंपनियां ले रही थीं, जिनमें नीम और हल्दी तक शामिल थी। मनमोहन सिंह ने इस मुद्दे को उठाया और अमेरिका इस पर तैयार हो गया कि यह नहीं होने पाएगा और एक ज्ञान कोष शुरू होगा जिसमें भारतीय चीजों का ब्यौरा रहेगा ताकि उनको कोई पेटेंट न करा सके।
रविवार, 29 नवंबर 2009
कार्बन उत्सर्जन में कटौती
जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन में होने वाले सम्मेलन से पूर्व भारत ने अपनी कार्बन उत्सर्जन तीव्रता में 2020 तक 20 से 25 फीसदी कटौती का एकतरफा ऐलान किया। साथ ही साफ कर दिया कि कोपेनहेगन में वह लचीला रुख जरूर अपनाएगा मगर बेडि़यों में बांधने वाले किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेगा, न ही इसके लिए वह किसी समय सीमा पर विकसित देशों के दबाव के आगे झुकेगा। भारत ने यह भी कहा है कि घरेलू उत्सर्जन नियंत्रण कार्यक्रम किसी अंतरराष्ट्रीय निगरानी के लिए नहीं खोले जाएंगे। वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने लोकसभा में भारत के रुख की घोषणा करते हुए कहा, कोपेनहेगन में देश के हित व अस्मिता से समझौते की आशंका बेमानी है। कार्बन उत्सर्जन पर किसी गैर बराबरी वाली संधि की कानूनी बंदिशों को हम स्वीकार नहीं करेंगे। हां इतना जरूर है कि जलवायु परितर्वन की चुनौतियों और इसके खतरों को देखते हुए कहेंगे कि भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उर्त्सजन विकसित देशों से कम रहेगा। जयराम ने कहा, कुछ देश इस प्रयास में लगे हैं कि भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश अपने कार्बन उत्सर्जन के चोटी पर पहंुचने की कोई समय सीमा तय कर लें, लेकिन भारत इस पर भी कोई समझौता नहीं करेगा। हम पर्यावरणीय अनुकूल तकनीक से विकास दर के अनुपात में कार्बन उत्सर्जन कम करेंगे। 1990 से 2005 के दौरान हमने उत्सर्जन दर में 17.6 फीसदी तक कमी की है। पर्यावरण मंत्री ने सांसदों की इस आशंका को निराधार बताया कि अमेरिका व विकसित देशों के दबाव में भारत अपने हितों की कुर्बानी देने जा रहा है। उनका कहना था कि भारत वैश्विक नेतृत्व के लिए तैयार है और ऐसे में उसे लीडरशिप दिखाते हुए अपनी तरफ से पहल करनी है। ताकि हम अमेरिका सहित तमाम विकसित देशों पर उत्सर्जन कम करने का नैतिक दबाव डाल अपना हित सुरक्षित रखें। इसलिए अब भारत केवल इसकी दुहाई नहीं दे सकता कि हमारा प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन तो विकसित देशों के मुकाबले एक चौथाई से भी कम है। जयराम ने कहा कि इस सकारात्मक व लचीले रुख के जरिए भारत कोपनहेगन में चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को साथ लेकर विकासशील देशों के साथ-साथ सबसे सर्वोपरि अपने हित को देखेगा।
कार्बन उत्सर्जन में कटौती की घोषणा कर भारत ने अपने रुख को लेकर उपजे संशय को तो दूर कर दिया, लेकिन यह कहना कठिन है कि भारत सरकार का यह निर्णय कोपेनहेगन सम्मेलन की सफलता में सहायक बन सकेगा। भले ही यह रेखांकित किया जाए कि वर्ष 2020 तक 20 से 25 प्रतिशत तक कटौती की भारत सरकार की घोषणा स्वैच्छिक है, लेकिन प्रतीत यही हो रहा है कि यह उस दबाव का परिणाम है जो अमेरिका और चीन की ऐसी ही घोषणाओं के चलते भारत पर बन गया था। कार्बन उत्सर्जन में कटौती की घोषणा करते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने जिस तरह यह कहा कि भारत कोपेनहेगन में अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत कानूनी बाध्यता वाले उत्सर्जन कटौती के किसी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेगा उससे कुल मिलाकर यही संकेत मिल रहा है कि यह सम्मेलन असफलता की ओर बढ़ रहा है। जयराम रमेश की घोषणा यह भी बता रही है कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती के मामले में विकसित और विकासशील देशों के बीच पाले खिंच गए हैं। इस पर आश्चर्य नहीं कि पर्यावरण विशेषज्ञों का एक समूह कोपेनहेगन सम्मेलन को विफल होते हुए देख रहा है। कुछ विशेषज्ञों का तो यह भी कहना है कि कोपेनहेगन सम्मेलन में उत्सर्जन कटौती के जो लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं वे बुनियादी तौर पर गलत हैं। वस्तुस्थिति जो भी हो, कार्बन उत्सर्जन में कटौती के मामले में विकासशील देशों को एकजुट रखने की भारत की कोशिश सफल होती नहीं दिख रही है, क्योंकि चीन के अलावा अन्य विकासशील देश अपनी-अपनी तरह से कार्बन उत्सर्जन की तीव्रता कम करने की पेशकश कर रहे हैं। यह विचित्र है कि भारत यह मान रहा है कि जलवायु परिवर्तन से वह कहीं अधिक प्रभावित होगा, लेकिन उसकी ओर से ऐसी कोई पहल नहीं की जा सकी जिससे कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने पर वैश्विक स्तर पर कोई साझा समझबूझ विकसित हो पाती। यह निराशाजनक है कि कोपेनहेगन सम्मेलन जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है उसकी सफलता को लेकर संदेह गहरा रहा है। ऐसा लगता है कि अपने-अपने हितों की रक्षा के फेर में भारत के साथ-साथ अन्य प्रमुख देश यह देखने से इनकार कर रहे हैं कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती की घोषणाओं का जलवायु पर कोई सकारात्मक प्रभाव पड़ने वाला है या नहीं, क्योंकि अभी तक कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की जो घोषणाएं की गई हैं वे जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को रोकने में नाकाम ही नजर आती हैं। यदि सभी देश कार्बन उत्सर्जन में कटौती की अपनी घोषणाओं पर वास्तव में अमल करते हैं तो भी वर्ष 2040 तक कुल कार्बन उत्सर्जन 1990 के स्तर के मुकाबले दो गुना होगा। इस संदर्भ में इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि कुछ वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी दी है कि भले ही कोपेनहेगन सम्मेलन में कार्बन उत्सर्जन के संदर्भ में किसी वैश्विक संधि पर सहमति बन जाए, लेकिन इससे तापमान में वृद्धि के खतरे समाप्त नहीं हो जाते। यह निराशाजनक है कि जब उम्मीद की जा रही थी कि भारत जलवायु परिवर्तन को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम होगा तब वह रक्षात्मक रवैया अपनाने के लिए विवश होता दिख रहा है
कोपेनहेगेन सम्मेलन के पूर्व कार्बन उत्सर्जन में कटौती को लेकर विकसित देश जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को रोकने के स्थान पर जिस तरह अपने-अपने हितों की रक्षा के लिए लामबंद हो गए हैं उससे एक ओर जहां भ्रम का वातावरण बना है वहीं दूसरी ओर उत्सर्जन नियंत्रण के लिए किसी न्यायसंगत व्यवस्था के निर्माण की संभावनाएं भी कम हो गई हैं। अमेरिका और चीन ने स्वेच्छा से कार्बन उत्सर्जन में कटौती की घोषणा कर दी। इस घोषणा का इसलिए कोई मूल्य नहीं, क्योंकि इन दोनों देशों ने वर्ष 2005 को आधार बनाकर कार्बन उत्सर्जन में कटौती की घोषणा की है, जबकि क्योटो प्रोटोकाल के अनुसार आधार वर्ष 1990 होना चाहिए था। अमेरिका और चीन जिस पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं उसे देखते हुए उनकी ओर से जो घोषणा की गई है वह दिखावटी ही अधिक है। इन घोषणाओं का मूल उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन में कटौती की किसी तार्किक व्यवस्था का निर्माण करने के स्थान पर वाहवाही लूटना और अन्य देशों पर अनुचित दबाव बनाना है। यह शुभ संकेत है कि राष्ट्रमंडल सम्मेलन में मनमोहन सिंह ने ऐसे किसी दबाव का प्रतिकार करने के स्पष्ट संकेत दिए, लेकिन भारत अपनी कोशिश में तभी सफल हो सकता है जब कार्बन उत्सर्जन में कटौती को लेकर विकासशील देश एकजुट बने रहें। फिलहाल यह कहना कठिन है कि यह एकजुटता बरकरार रहेगी या नहीं, क्योंकि इस मामले में जहां भारत और चीन एकजुट दिख रहे हैं वहीं वन एवं पर्यावरण मंत्री यह स्पष्ट नहीं कर पा रहे हैं कि उनका एजेंडा क्या है? भले ही जलवायु परिवर्तन पर भारत के दूत की भूमिका निभा रहे श्याम सरन यह कह रहे हों कि औद्योगिक देशों का भारत पर कोई दबाव नहीं है, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि किसी न किसी स्तर पर दबाव तो है ही और इसका प्रमाण खुद वन एवं पर्यावरण मंत्री की ओर से लिखे गए उस पत्र से मिलता है जिसमें कार्बन उत्सर्जन में कटौती के संदर्भ में नीति बदलने की जरूरत जताई गई थी। फिलहाल यह कहना कठिन है कि भारत अंतत: किस नतीजे पर पहुंचेगा, लेकिन यह समय की मांग है कि ऐसे प्रयास गंभीरता से किए जाएं जिनसे कोपेनहेगन सम्मेलन को सफल बनाया जा सके। यदि यह सम्मेलन असफल होता है तो इसके दुष्परिणाम भारत सरीखे देशों को ही भुगतने पड़ेंगे। एक ऐसे समय जब जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव सामने आ चुके हैं और तत्काल प्रभाव से कुछ करने की आवश्यकता है तब भारत को न केवल प्रभावी भूमिका निभाने के लिए तैयार रहना चाहिए, बल्कि अपने हितों की रक्षा के लिए भी। यह सही है कि जलवायु परिवर्तन के लिए मुख्य रूप से विकसित देश जिम्मेदार हैं, लेकिन अब इस तर्क का कोई विशेष मूल्य नहीं कि विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन में विशेष रियायत मिलनी चाहिए। आखिर जब ऐसी तकनीक उपलब्ध है जिससे आर्थिक विकास पर अंकुश लगाए बगैर कार्बन उत्सर्जन में कटौती की जा सकती है तब फिर कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि विकासशील देश विकसित देशों से वह तकनीक हासिल कर सकें जो कार्बन उत्सर्जन में नियंत्रण में सहायक हो।
कार्बन उत्सर्जन में कटौती की घोषणा कर भारत ने अपने रुख को लेकर उपजे संशय को तो दूर कर दिया, लेकिन यह कहना कठिन है कि भारत सरकार का यह निर्णय कोपेनहेगन सम्मेलन की सफलता में सहायक बन सकेगा। भले ही यह रेखांकित किया जाए कि वर्ष 2020 तक 20 से 25 प्रतिशत तक कटौती की भारत सरकार की घोषणा स्वैच्छिक है, लेकिन प्रतीत यही हो रहा है कि यह उस दबाव का परिणाम है जो अमेरिका और चीन की ऐसी ही घोषणाओं के चलते भारत पर बन गया था। कार्बन उत्सर्जन में कटौती की घोषणा करते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने जिस तरह यह कहा कि भारत कोपेनहेगन में अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत कानूनी बाध्यता वाले उत्सर्जन कटौती के किसी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेगा उससे कुल मिलाकर यही संकेत मिल रहा है कि यह सम्मेलन असफलता की ओर बढ़ रहा है। जयराम रमेश की घोषणा यह भी बता रही है कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती के मामले में विकसित और विकासशील देशों के बीच पाले खिंच गए हैं। इस पर आश्चर्य नहीं कि पर्यावरण विशेषज्ञों का एक समूह कोपेनहेगन सम्मेलन को विफल होते हुए देख रहा है। कुछ विशेषज्ञों का तो यह भी कहना है कि कोपेनहेगन सम्मेलन में उत्सर्जन कटौती के जो लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं वे बुनियादी तौर पर गलत हैं। वस्तुस्थिति जो भी हो, कार्बन उत्सर्जन में कटौती के मामले में विकासशील देशों को एकजुट रखने की भारत की कोशिश सफल होती नहीं दिख रही है, क्योंकि चीन के अलावा अन्य विकासशील देश अपनी-अपनी तरह से कार्बन उत्सर्जन की तीव्रता कम करने की पेशकश कर रहे हैं। यह विचित्र है कि भारत यह मान रहा है कि जलवायु परिवर्तन से वह कहीं अधिक प्रभावित होगा, लेकिन उसकी ओर से ऐसी कोई पहल नहीं की जा सकी जिससे कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने पर वैश्विक स्तर पर कोई साझा समझबूझ विकसित हो पाती। यह निराशाजनक है कि कोपेनहेगन सम्मेलन जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है उसकी सफलता को लेकर संदेह गहरा रहा है। ऐसा लगता है कि अपने-अपने हितों की रक्षा के फेर में भारत के साथ-साथ अन्य प्रमुख देश यह देखने से इनकार कर रहे हैं कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती की घोषणाओं का जलवायु पर कोई सकारात्मक प्रभाव पड़ने वाला है या नहीं, क्योंकि अभी तक कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की जो घोषणाएं की गई हैं वे जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को रोकने में नाकाम ही नजर आती हैं। यदि सभी देश कार्बन उत्सर्जन में कटौती की अपनी घोषणाओं पर वास्तव में अमल करते हैं तो भी वर्ष 2040 तक कुल कार्बन उत्सर्जन 1990 के स्तर के मुकाबले दो गुना होगा। इस संदर्भ में इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि कुछ वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी दी है कि भले ही कोपेनहेगन सम्मेलन में कार्बन उत्सर्जन के संदर्भ में किसी वैश्विक संधि पर सहमति बन जाए, लेकिन इससे तापमान में वृद्धि के खतरे समाप्त नहीं हो जाते। यह निराशाजनक है कि जब उम्मीद की जा रही थी कि भारत जलवायु परिवर्तन को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम होगा तब वह रक्षात्मक रवैया अपनाने के लिए विवश होता दिख रहा है
कोपेनहेगेन सम्मेलन के पूर्व कार्बन उत्सर्जन में कटौती को लेकर विकसित देश जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को रोकने के स्थान पर जिस तरह अपने-अपने हितों की रक्षा के लिए लामबंद हो गए हैं उससे एक ओर जहां भ्रम का वातावरण बना है वहीं दूसरी ओर उत्सर्जन नियंत्रण के लिए किसी न्यायसंगत व्यवस्था के निर्माण की संभावनाएं भी कम हो गई हैं। अमेरिका और चीन ने स्वेच्छा से कार्बन उत्सर्जन में कटौती की घोषणा कर दी। इस घोषणा का इसलिए कोई मूल्य नहीं, क्योंकि इन दोनों देशों ने वर्ष 2005 को आधार बनाकर कार्बन उत्सर्जन में कटौती की घोषणा की है, जबकि क्योटो प्रोटोकाल के अनुसार आधार वर्ष 1990 होना चाहिए था। अमेरिका और चीन जिस पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं उसे देखते हुए उनकी ओर से जो घोषणा की गई है वह दिखावटी ही अधिक है। इन घोषणाओं का मूल उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन में कटौती की किसी तार्किक व्यवस्था का निर्माण करने के स्थान पर वाहवाही लूटना और अन्य देशों पर अनुचित दबाव बनाना है। यह शुभ संकेत है कि राष्ट्रमंडल सम्मेलन में मनमोहन सिंह ने ऐसे किसी दबाव का प्रतिकार करने के स्पष्ट संकेत दिए, लेकिन भारत अपनी कोशिश में तभी सफल हो सकता है जब कार्बन उत्सर्जन में कटौती को लेकर विकासशील देश एकजुट बने रहें। फिलहाल यह कहना कठिन है कि यह एकजुटता बरकरार रहेगी या नहीं, क्योंकि इस मामले में जहां भारत और चीन एकजुट दिख रहे हैं वहीं वन एवं पर्यावरण मंत्री यह स्पष्ट नहीं कर पा रहे हैं कि उनका एजेंडा क्या है? भले ही जलवायु परिवर्तन पर भारत के दूत की भूमिका निभा रहे श्याम सरन यह कह रहे हों कि औद्योगिक देशों का भारत पर कोई दबाव नहीं है, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि किसी न किसी स्तर पर दबाव तो है ही और इसका प्रमाण खुद वन एवं पर्यावरण मंत्री की ओर से लिखे गए उस पत्र से मिलता है जिसमें कार्बन उत्सर्जन में कटौती के संदर्भ में नीति बदलने की जरूरत जताई गई थी। फिलहाल यह कहना कठिन है कि भारत अंतत: किस नतीजे पर पहुंचेगा, लेकिन यह समय की मांग है कि ऐसे प्रयास गंभीरता से किए जाएं जिनसे कोपेनहेगन सम्मेलन को सफल बनाया जा सके। यदि यह सम्मेलन असफल होता है तो इसके दुष्परिणाम भारत सरीखे देशों को ही भुगतने पड़ेंगे। एक ऐसे समय जब जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव सामने आ चुके हैं और तत्काल प्रभाव से कुछ करने की आवश्यकता है तब भारत को न केवल प्रभावी भूमिका निभाने के लिए तैयार रहना चाहिए, बल्कि अपने हितों की रक्षा के लिए भी। यह सही है कि जलवायु परिवर्तन के लिए मुख्य रूप से विकसित देश जिम्मेदार हैं, लेकिन अब इस तर्क का कोई विशेष मूल्य नहीं कि विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन में विशेष रियायत मिलनी चाहिए। आखिर जब ऐसी तकनीक उपलब्ध है जिससे आर्थिक विकास पर अंकुश लगाए बगैर कार्बन उत्सर्जन में कटौती की जा सकती है तब फिर कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि विकासशील देश विकसित देशों से वह तकनीक हासिल कर सकें जो कार्बन उत्सर्जन में नियंत्रण में सहायक हो।
नक्सलवादी खतरा
अमेरिका की एक प्रमुख संस्था स्ट्राटफोर ने दावा किया है कि भारत सरकार के ग्रमीण क्षेत्रों की अनदेखी के कारण वामपंथी अलगाववाद की समस्या उत्पन्न हो गई है और यह देश की सुरक्षा के समक्ष गंभीर खतरा है। स्ट्राटफोर ने नक्सलवादी खतरे से निपटने के अभियान में लगे सुरक्षा बलों की क्षमता पर भी संदेह उठाया है। स्ट्राटफोर ने कहा कि नक्सलवादी खतरा भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष सबसे गंभीर खतरा है। आज अलगाववाद का जो स्वरूप हम देख रहे हैं, वह दशकों तक भारत सरकार की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों की उपेक्षा का परिणाम है। इससे नक्सलवादियों को अपना अभियान चलाने के लिए उर्वर जमीन तैयार मिली है और उन्होंने इसका उपयोग अलगाववादी गतिविधियों की रणनीति के लिए किया है। भल्ला ने कहा कि ग्रामीण भारत में बिना सतत विकास गतिविधियों के नक्सलवादी समस्याएं बनी रहेंगी। भारत के आंतरिक सुरक्षा बल इन खतरों का सामना करने के लिए पूरी तरह से उपकरणों से लैस नहीं हैं। छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार समेत 20 राज्यों को नक्सल चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। माओवादी हिंसा के तेजी से पांव पसारने की बात को स्वीकार करते हुए केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लै ने हाल ही में संसद की स्थाई समिति की बैठक में स्वीकार किया कि नक्सल प्रभावित राज्यों में 40 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि नक्सलवाद देश के 20 राज्यों में फैल गया है और इससे देश के 223 जिलों में 2,000 पुलिस स्टेशन के इलाके आंशिक या व्यापक रूप से प्रभवित हैं।
कैगा परमाणु संयंत्र में बड़ी साजिश
परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोदकर और केंद्रीय परमाणु ऊर्जा राज्य मंत्री पृथ्वीराज चह्वाण ने बताया कि किसी ने गत 24 नवंबर को जान-बूझ कर संयंत्र के वाटर कूलर में रेडियोएक्टिव पदार्थ ट्राइटियम (हाइड्रोजन का एक रूप, जिसका इस्तेमाल शोध, फ्यूजन रिएक्टरों और न्यूट्रान जेनेरेटरों में किया जाता है।) मिलाया था। इस वजह से 55 कर्मचारी विकिरण के शिकार हो गए। नियमित जांच में उनके शरीर में ट्राइटियम की मात्रा बढ़ी पाई गई।
कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ा जिले में स्थित कैगा परमाणु ऊर्जा संयंत्र की तीन इकाइयां काम कर रही हैं, जबकि चौथी इकाई अभी बन रही है। भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम द्वारा संचालित यह संयंत्र 1989 में बना और 16 नवंबर, 2000 से इसमें बिजली बनने लगी। इसकी तीनों इकाइयों की क्षमता 220-220 मेगावाट की है। दो नंबर और तीन नंबर की इकाई से बिजली उत्पादन हो रहा है। एक नंबर की इकाई रखरखाव के लिए 20 अक्टूबर से बंद है। इसी इकाई के वाटर कूलर में ट्राइटियम मिलाया गया।
कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ा जिले में स्थित कैगा परमाणु ऊर्जा संयंत्र की तीन इकाइयां काम कर रही हैं, जबकि चौथी इकाई अभी बन रही है। भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम द्वारा संचालित यह संयंत्र 1989 में बना और 16 नवंबर, 2000 से इसमें बिजली बनने लगी। इसकी तीनों इकाइयों की क्षमता 220-220 मेगावाट की है। दो नंबर और तीन नंबर की इकाई से बिजली उत्पादन हो रहा है। एक नंबर की इकाई रखरखाव के लिए 20 अक्टूबर से बंद है। इसी इकाई के वाटर कूलर में ट्राइटियम मिलाया गया।
शीघ्र दूर होंगी एटमी डील की बाधाएं
भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के तहत एक को छोड़कर करार से जुड़े तमाम मुद्दों को सुलझा लिया गया है और वार्ता अंतिम चरण में है।परमाणु ऊर्जा पुन: प्रसंस्करण से संबंधित एक अहम करार दो सप्ताह के भीतर ही पूरा होने की उम्मीद है। भारत को इस्तेमाल किए गए परमाणु ईधन के दोबारा प्रसंस्करण की सुविधा मुहैया हो जाएगी। सारी जद्दोजहद पुन: प्रसंस्करण को निलंबित किए जाने की शर्त और मापदंड तय करने पर हो रही है। केवल एक मुद्दा बचा है जो विधिक प्रारूप को अंतिम रूप देने से संबंधित है।
भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु करार को अमलीजामा पहनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के सुरक्षा मापदंडों के तहत पुन: प्रसंस्करण संयंत्र की स्थापना एक महत्वपूर्ण जरूरत है।
समझौते के मार्ग में आड़े आ रहे दो प्रमुख मुद्दों को सुलझा लिया गया है। लगभग तय हो गया है कि कितने संयंत्र स्थापित किए जाने चाहिए और इनकी सुरक्षा किस प्रकार की रहनी चाहिए। जानकारी मिली है कि अमेरिका की कोशिश बहुउपयोगी प्रतिष्ठान स्थापित करने की है। इसके लिए उसने तर्क यह दिया था कि अमेरिका द्वारा भारत में परमाणु संयंत्रों की स्थापना शुरू किए जाने के बाद पुन:प्रसंस्करण का काम बढ़ेगा और अधिक प्रतिष्ठान होने से अमेरिका को फायदा होगा। सुरक्षा के बारे में अमेरिका की तर्ज पर संरक्षात्मक प्रणाली स्थापित किए जाने पर सहमति बनी है। तीसरा अहम मसला यह था कि क्या किसी भी समय पुन: प्रसंस्करण को निलंबित किया जा सकता है और किन परिस्थितियों में तथा किस शर्त पर? सूत्रों ने बताया कि दोनों पक्ष इस मामले में आपसी रूप से स्वीकार्य विधिक प्रारूप पर काम कर रहे हैं।
पुन: प्रसंस्करण प्रतिष्ठान का इस्तेमाल केवल अमेरिकी ईधन के लिए किया जाएगा, सूत्रों ने बताया कि यह प्रतिबद्धता केवल अमेरिकी ईधन के बारे में है। दूसरे देशों के पुन: प्रसंस्करण ईधन के बारे में कोई मसला नहीं है .
भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु करार को अमलीजामा पहनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के सुरक्षा मापदंडों के तहत पुन: प्रसंस्करण संयंत्र की स्थापना एक महत्वपूर्ण जरूरत है।
समझौते के मार्ग में आड़े आ रहे दो प्रमुख मुद्दों को सुलझा लिया गया है। लगभग तय हो गया है कि कितने संयंत्र स्थापित किए जाने चाहिए और इनकी सुरक्षा किस प्रकार की रहनी चाहिए। जानकारी मिली है कि अमेरिका की कोशिश बहुउपयोगी प्रतिष्ठान स्थापित करने की है। इसके लिए उसने तर्क यह दिया था कि अमेरिका द्वारा भारत में परमाणु संयंत्रों की स्थापना शुरू किए जाने के बाद पुन:प्रसंस्करण का काम बढ़ेगा और अधिक प्रतिष्ठान होने से अमेरिका को फायदा होगा। सुरक्षा के बारे में अमेरिका की तर्ज पर संरक्षात्मक प्रणाली स्थापित किए जाने पर सहमति बनी है। तीसरा अहम मसला यह था कि क्या किसी भी समय पुन: प्रसंस्करण को निलंबित किया जा सकता है और किन परिस्थितियों में तथा किस शर्त पर? सूत्रों ने बताया कि दोनों पक्ष इस मामले में आपसी रूप से स्वीकार्य विधिक प्रारूप पर काम कर रहे हैं।
पुन: प्रसंस्करण प्रतिष्ठान का इस्तेमाल केवल अमेरिकी ईधन के लिए किया जाएगा, सूत्रों ने बताया कि यह प्रतिबद्धता केवल अमेरिकी ईधन के बारे में है। दूसरे देशों के पुन: प्रसंस्करण ईधन के बारे में कोई मसला नहीं है .
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